Monday, November 4, 2013

अँधेरों को आफताब देखता हूँ।

 मैं   अपने एक कवि  मित्र  की  रचना आपको  भेँट कर रहा हुँ  ।  जो काव्यकुल के  एक छोटे बेटे कि तरह है परन्तु उनके 
लेखनी का तेज़ इतना  है कि काव्य जगत में व्याप्त वर्तमान  अँधेरा  दूर कर देगा  !!!
 
में जागती आँखों से कुछ ख्वाब देखता हूँ।
काँटों की अँजुमन से गुलाब देखता हूँ।

धारदार नस्तरों को जेब मे रखते हुए।
घनघोर अँधेरों को आफताब देखता हूँ।

जो कभी पर्दानशीं थे आज बेपर्दा हुए।
उम्र का ढलता हुआ सबाब देखता हूँ।

उस रोज जाते जाते जो खत लिखा था उसने।
मैं आज तक उस खत का जबाब देखता हूँ।

मैं जागती आँखों से कुछ ख्वाब देखता हूँ......

                                     ...एलेश
भाई सहब 

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