Tuesday, November 26, 2013

फिर मन्दिर को कोई ‘मीरा’ दीवानी दे मौला

नमस्कार साथियों,
                        मै पांच दिनों  से आपके बीच अनुपस्थित  रहा इस  अछम्य अपराध के लिए माफ़ी चाहुंगा !
हालाँकि मैं ये समझता हुँ  कि आपका आशीर्वाद मुझ पे हमेशा कि तरह बरकरार रहेगा !
निदा फ़ाज़ली साहब को आज पढ़ने का सौभाग्य मिला . अनुभव  साझा कर   हूँ  …

गरज-बरस प्यासी धरती पर
फिर पानी दे मौला
चिड़ियों को दाने, बच्चो को
गुड़धानी दे मौला

दो और दो का जोड़ हमेशा
चार कहाँ होता है
सोच-समझवालों को थोड़ी
नादानी दे मौला

फिर रौशन कर ज़हर का प्याला
चमका नयी सलीबें
झूठों की दुनिया में सच को
ताबानी1 दे मौला

फिर मूरत से बाहर आकर
चारों ओर बिखर जा
फिर मन्दिर को कोई ‘मीरा’
दीवानी दे मौला

तेरे होते कोई किसी की
जान का दुश्मन क्यों हो
जीनेवालों को मरने की
आसानी दे मौला

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