Saturday, November 2, 2013

बेच रहे हैं आज धर्म को, धर्म के ठेकेदार

DEEPAK SUKLA SIR !

बेच रहे हैं आज धर्म को, धर्म के ठेकेदार
जाने कितनों के हिस्से हैं, हैं कितने हिस्सेदार

कोई योग को बेच रहा है, कोई योगी को
बापू बापू कहते हैं, सब देखो भोगी को
किसी के चेले नेता हैं, तो किसी के है स्टार
बेच रहे हैं आज धर्म को, धर्म के ठेकेदार

जीवन जीना सिखलाते हैं, पर मुफ़्त नहीं है सीख
बड़े-बड़े आश्रम में देखो, मांगी जाती भीख
दावा है अच्छा करने का, पर खुद हैं ये बीमार
बेच रहे हैं आज धर्म को, धर्म के ठेकेदार

कोई निवारण करे दुखों का, कोई करे समागम
लेके देवी रूप है पाती, नोट कोई झमाझम
कहें सादगी में ईश्वर है, करें खूब श्रृंगार
बेच रहे हैं आज धर्म को, धर्म के ठेकेदार

धर्म सत्य है, धर्म शील है, धर्म है संयम में
इनमें सत्य, ना शील बचा है, ना रहते संयम में
फिर भी भारी भीड़ जुटा लेते हैं ये हर बार
बेच रहे हैं आज धर्म को, धर्म के ठेकेदार

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