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Tuesday, March 3, 2020

ओ बेखबर..तू क्यों दरबदर??

शहर-शहर, नगर-नगर
डगर-डगर, इधर-उधर?
पथिक तुझे तलाश क्या?
क्या चाहिये ओ बेखबर??

किसे तू है ढूँढता
क्या तुझमें नहीं खुदा ?
घर, लौट आ वक़्त पर
भटक रहा क्यों दरबदर?

मन में बस विश्वाश रख
खुद को अपने साथ रख
तू नाप लेगा ये धरा
कदमों में तेरे धरा शिखर

है मौन कुछ तो बोलता
चुप्पियों को सुन जरा
ये शोर है, वो झूठ है
भीड़ पर मत रख नज़र

चल पड़े हो तो सुनो
ख्वाब एक नया बुनो
रास्ते पर हक़ तुम्हारा
क्या सोंचते हो बैठ कर?

सुनता नहीं कोई यहाँ
हर कोई जवाब है
पत्थर तुझको ही पड़ेंगे
उंचे तेरे ख्वाब हैं।

समन्दर में तूम जा मिलोगे
बस एक नदी को पार कर
जीत जायेगा जहाँ तू 'अभय'
अपना सबकुछ हार कर।।

 ओ बेखबर..तू क्यों दर बदर??
Copyright कुमार अभय

Sunday, April 30, 2017

कुछ पंक्तियाँ दोस्तों के नाम

बड़े दिनों बाद लिख रहा हूँ... कुछ पंक्तियाँ दोस्तों के नाम।
आशा करता हूँ आपसे वही प्यार मिलेगा जैसा आप मुझे हमेशा से देते आये हैं। इस कविता की शुरुआत मैंने अपने शहर के चाय केंद्र से की है जहाँ हम दोस्तों के मिलने का केंद्र स्थल होता है। इस जगह हम दोस्त मिलकर अपने हफ़्ते भर के थकन, और परेशानियों को मुँह चिढ़ाते हैं। 

नया मोड़ की चाय हो,
साथ में अपने भाय हों
लाईफ अपनी कुल गाय सी
मुसीबत भले कसाई हो

बस संग में अपने भाई हो...
दो बातें तेरे मन की
कुछ शरारत बचपन की
तु संग ही सब मस्ती अपनी
चाहे दिनभर ना कमाई हो

संग में अपने भाई हो...
सावन ना आए बात नहीं
पतझड़ ही बस आने दो
ऐसे ही हंसते रहना तुम
चाहे लाख तुफानें आई हों
कोई संग भले न हों

संग में अपने भाई हों ...
तुम हो तो खुदा अपना
तुम ही हो, तो खुदाई हो
तेरे रिश्ते की कैद भली है
ताउम्र भले ना रिहाई हो
जब कुछ भी अपनी हो न हो

बस संग में अपने भाई हों
सब कुछ अधुरा सा लगे
बुलंदी भी जैसे खाई हो
सब रूठे तुम ना रूठे
उम्र भर ना जुदाई है
सब कुछ छीन ऐ जिंदगी

बस संग में अपने भाई हों...
मिलिए मेरी मित्र मंडली से 🔺⥣

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ...

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ... एक जादूगर जादू करता था, तितली को कबूतर, कबूतर को बाज़ और बाज़ को मोर बना देता था। ...