Tuesday, November 12, 2013

परिंदो को आकाश दे दो…

 मैंने आज कुछ लिखने का मन  हुआ और मैंने कलम उठाया और लिख डाली,
 आलोचनायें आमंत्रित हैं … 

नहीं रोयेंगी कोई आँखे,
मुझे विश्वास दे दो !
सारी ज़मीं तुम रखलो,
मुझे आकाश दे दो …

बहुत हो चुकी  तकरारें !
बहुत बन चुकी दीवारें !
तोड़ कर सारी सरहदें,
परिंदो को आकाश दे दो…

ग़म सबके कम हो जाएँ ,
अधरों को मुस्कान मिले !
ले आओ सबकी तकलीफें,
सब-के-सब मेरे पास दे दो…   

हीरे-मोती कब माँगा मै ?
एक एहसान कर मौला !
ज़मीर जिनके मर चुके,
उन लाशों में जान दे दो .…
             …  निशब्द अभय 





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