Sunday, December 28, 2025

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ...


अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ... एक जादूगर जादू करता था, तितली को कबूतर, कबूतर को बाज़ और बाज़ को मोर बना देता था। पलक झपकते कबूतर गायब कर देता था। उसको ऐसे कई खेल आते थे हंसते को रुला देता था रोते को हंसा देता था। वो अपने खेल में दुःख देने वाले दानव को पाताल लोक में भेज देता था, ताकि वो फिर से ना आ सके और लोगों में जादूगर जीत जाता था।

बच्चे समझते थे जादूगर कुछ भी कर सकता है। वो बहुत तेज़ दिमाग आदमी है, वो आदमी नहीं जादूगर है। जादूगर जादू करके सब कुछ ठीक कर सकता है। वहीं जवान और बूढ़े करतब, विज्ञान और हाथों की सफाई समझते थे। जो उसके जादू को समझना था वह बच्चे पैसे नहीं दे सकते थे जो पैसे दे सकते थे वह बड़े लोग बुजुर्ग लोग उसे चालबाज और खेलबाज़ कहते थे।

जादूगर जादू दिखने के बदले बहुत कम पैसे लेता था और जिसके पास पैसे न हो, उसको मुफ़्त में करतब दिखाता था। वो सबको ज़िंदादिल लगता, सबका हीरो मसीहा। वैसे तो हर जगह चालू करने वाला जादूगर घर वालों पर जादू नहीं कर पता था। घर के सब नाराज रहते थे उससे कहते सबको खुश रखते हो घर पर तुम्हारी जादूगरी नहीं चल पाती, आटा दाल बनाने वाली जादू कर के ले आओ न। वो था की घर में किसी की नहीं सुनता था कहता था एक दिन वो बहुत बड़ा जादू करेगा, छड़ी घुमाएगा और सबकुछ बदल जाएगा और वह जोर से हंसने लगता उसके हंसी में आत्मविश्वास होता था कि वह सब कुछ बदल देगा पल भर में। 

जब वो जादूगर, अपने कपड़े पहनता तो उसमें शक्तियां जन्म ले लेती। रंग-बिरंगे कपड़े पहन कर वह खुश हो जाता था क्योंकि इससे वह किसी रोते हुए को हंसने के लिए तैयार हो जाता था।


दिन भर सबको करतब दिखाता,

शाम को जब हुआ लौट कर आता।

 घर में नहीं होता अनाज दाना, 

घर वाले कसने लगता ताना।

कहते हैं यह सब को बाहर हंसता है, 

फिर भी घर में दाना पानी नहीं ला पता है 

कैसा है यह जादूगर?

जिसको घर की रोटी की चिंता नहीं सर पर 

इस पर जादूगर कहता एक दिन बड़ा जादू करूंगा 

सबकी ख्वाहिशों को चुटकी में भरूंगा 

फिर घर में भी कोई नहीं होगा उदास 

सबके लिए उपहार होगा खास 

बुरे दिन टल जाएंगे अच्छे दिन खिल खिलाएंगे


अगले दिन जादूगर उठा, और घर में सबसे बोला 

आज करने जा रहा हूं बड़ा जादू 

दिल पर रखना काबू...  कुछ बड़ा होने वाला है।

खुशियां जागने वाली है, दुख का दानव सोने वाला है।


जादूगरी का सामान उठाया, चल पड़ा घर से...

पहुंच गया दिखने जादू भीड़ देखकर जादूगर को हो गए बेकाबू 

कहां आज जादूगर दिखाने वाला है कुछ खास 

सभी लोग उत्सुक थे दबाकर बैठे थे सांस 


इतने में जादूगर आया हाथ में छड़ी उठा कर लाया और बोला आदमी को कबूतर, कबूतर को आप भी बना दूं।

तुम जो कहोगे वह खेल तुमको दिखा दूं ।

लोग बजाने लगे ताली कोई जगह नहीं रह गई खाली

हर तरफ तालिया की गाड़ाहट थी।

जादूगर के हाथ में छड़ी 

वह भी इतनी बड़ी 

उसको वउसको घुमाया, और लोगों को बताया मैं खुद को संदूक में बंद कर रहा हूँ, 

जब मुझको हो बुलाना मुझे बस इतना आवाज लगाना 

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ...

संदूक में खुद को बंद कर लिया और अंदर से आवाज लगाया...अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ... 

कुछ देर बाद संदूक खोला उसमें नहीं था जादूगर, उसमें पड़ा था एक कबूतर... संदूक खोलते ही वह उड़ गया। 

कुछ देर बीता तो लोग ढूंढने वालों की जादूगर किधर गया? 

वो आएगा? 

किधर से आएगा? लोग कर रहे थे इंतजार, कह रहे थे बार बार 

 अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ... नहीं लौटा जादूगर, लोग कहने लगे जादूगर अपने ही जादू में गायब हो गया।



Monday, December 15, 2025

उम्र बढ़ रही है, संघर्ष जारी है, तजुर्बा भी बढ़ना चाहिए था.



Aawara kalam
उम्र बढ़ रही है, संघर्ष जारी है, तजुर्बा भी बढ़ना चाहिए था , जो मुझे नहीं लगता है कि बढ़ रहा है। दिन प्रतिदिन जुड़कर सप्ताह, सप्ताह से महीना और महीने साल होते जा रहे हैं और जिंदगी के तीसों साल गुजर गए। पीछे झांकने पर लगता है कि बहुत कुछ हो जाना चाहिए था जो अभी तक नहीं हुआ। मुझे किसी ऐसी जगह पहुंचाना चाहिए था जहां जिंदगी का रास्ता आसान हो जाता लेकिन मजाल है, हो जाए। चुनौती हौसले पर हंसती नजर आती है। कभी कभार गुस्से से तिलमिला उठता हूँ।

हार, फिर हार और लगातार हारना भी मुझे अभ्यस्त बना रहा है कि मैं आदि हो जाऊंगा की हारना बुरा नहीं लगे और मैं धीरे-धीरे जीतने की कोशिश भी त्याग दूं। सब कहते हैं उम्मीद जिंदा रहनी चाहिए जरूरी होता है जीने के लिए। लेकिन इतनी उम्र तक जीने के बाद यह बातें खोखले लगने लगते हैं।

क्या कर रहा हूँ? क्यों कर रहा हूँ ? पता नहीं चल रहा है। लेकिन हाँ, चल रहा हूँ हवाओं के इशारों में... जिधर चल रही है, उधर चला जा रहा हूँ। पहले तो रुक कर सोंचता था यह करना था, यह नहीं करना। अब तो बस चीज़ें होती जा रही हैं। चाहे जो भी हो, अच्छा तो नहीं कह सकते पर कौन सोंच विचार करे। क्या? क्यों? कैसे? जो होना है होगा। अब इसी सिद्धांत पर सर टिका कर निश्चित हूँ।
कुछ दिनों से मैं खुद में एक बदलाव देख रहा हूं पहले साथ के लोगों के आगे बढ़ने पर खुश होता था। लेकिन अब देखता हूँ कि मैं जब छोटी-छोटी चीजों को पूरा नहीं कर पाता हूं तो मुझे साथ के लोगों पर जलन सी होने लगी है। मैं महसूस कर रहा हूं कि जिसके साथ में कभी ऊंचे आवाज में बात नहीं करता था। उनके साथ मेरा बर्ताव बिगड़ रहा है, और बेहद रूखा हो गया हूँ। लोगों से दूरी बन रही है। वो लोग पीछे छूट रहे हैं या फिर आगे चले जा रहे हैं पता नहीं, जिनसे यह बात की जा सकती थी । 
  अब वो बातें कहां की जाए तो सोचा लिख देते हैं। क्योंकि यही वह जगह है जहां बातें की जा सकती हैं। अपनी बातें बताई जा सकती हैं। यहां यह सहूलियत तो होगी कि मेरे हार वाली बातों पर कोई हंसेगा नहीं, यहां मुझे बातें बताते हुए या लिखते हुए कोई संकोच नहीं होगा। 

मुझे लगता है की बातें बता देने से या लिख देने से आपकी नकारात्मकता दुख निकल जाता है और आप अगला दिन जीने के लिए तैयार हो जाते हैं। आपके साथ राज साझा करने के पीछे मेरा एक मानना यह है कि यहां मेरे राज सुरक्षित रहेंगे बिना किसी डर के, बिना किसी भय के, की कोई मुझ पर हंसेगा। 

खैर अब तक की लिखी बातें मैं भावनाओं के आवेग में बहकर लिख दिया हूँ इसमें क्या लिखा गया है नहीं पता की ये सही है, गलत है, गड़बड़ है यह आप देख लीजिएगा... इसका कोई अर्थ निकलेगा, नहीं निकलेगा यह भी नहीं जानता। बस एक बात पता है कि अब हमारी बातें लिखी जाती रहेंगी।

आपका अभय।

Sunday, April 13, 2025

ये कहाँ आ गए... हम?

बहुत तेज़ दौड़ रहा था, कहीं पहुँचने के लिए बेतहाशा भाग रहा था। ऐसा भाग रहा था, मानो सबसे पहले मैं ही पहुँच जाऊँगा। भागते समय यह ख़याल भी नहीं रहा कि भागते-भागते चीज़ें पीछे छूटती जा रही हैं।दौड़ आज भी जारी है। आज भी दुनिया की नज़रों में किसी के आगे या किसी के पीछे भाग ही रहा हूँ। इस दौड़ पर कुछ लोग तालियाँ पीटते हैं, तो कुछ गालियाँ बरसाते हैं।इस भागमभाग में कुछ लोग आगे चले गए, तो कुछ पीछे छूट गए। जब मैं दौड़कर थक जाता हूँ या ठोकर खाकर गिर पड़ता हूँ, तब कुछ लोगों की तलाश करता हूँ कि कहाँ गए सब? अभी तो यहीं थे, साथ में? एक साथ ही तो चले थे! सभी को कहा गया था कि हाथ कसकर पकड़े रखना, ताकि कोई छूटे नहीं। लेकिन जब मैं थका हूँ, पाँव में चोट लगी है, तब कोई नज़र नहीं आता। पीछे जाकर उनकी तलाश करने की कोशिश करता हूँ, तो आगे की ओर बेतहाशा दौड़ती भीड़ मुझे कुचल देना चाहती है।कुछ देर रुककर इंतज़ार करता हूँ, तो भागने वाले लोग धक्का देकर मुझे किनारे कर देना चाहते हैं। हमारी बात हुई थी कि अगर हम में से किसी को ठोकर लगे, तो एक-दूसरे को मरहम लगाने का रिवाज़ बनाए रखेंगे। सफ़र का सारा सामान हम साथ लेकर चले थे।आज मुझे ठोकर लगी है, मैं थका हुआ हूँ, लेकिन हमारे पास कुछ भी नहीं—न हम, न मरहम! अगर कुछ है हमारे पास, तो वह है सफ़र, अपने हिस्से का... जो जारी रहेगा... ज़िंदा रहने तक!
ये कहाँ आ गए...?

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ...

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ... एक जादूगर जादू करता था, तितली को कबूतर, कबूतर को बाज़ और बाज़ को मोर बना देता था। ...