दीप जलाओ दीप जलाओ आज दिवाली रे ..
यह वाली कविता तो सुने होंगे आप इसमें कवि कहना चाहता है कि आप दीपावली में दीपक यानी दिया जलाएं। मुझे लगता है कि यह कविता थोड़ी old-fashioned हो गई है और वर्तमान समय के खाचे में फिट नहीं बैठती जरा आप ही सोचिए की आज के जमाने में कौन दिया जलाता है भाई ? वो भी मिट्टी का? धन की देवी लक्ष्मी के पूजा में मिट्टी का दिया जलाना थोड़ा ऑड सा लगता है। इस से इम्प्रेशन मैं बट्टा भी लग जाएगा। महालक्ष्मी क्या सोचेंगी कि इसको इतना धन संपदा दिया है और यह मेरी ही पूजा में मिट्टी के दीपक जला मेरा भक्त मेरे साथ बेमानी कर रहा है। देवी अगर एक बार सैड हो गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे!
यह बात सोच कर ही रूह कांप जाती है की पड़ोस वाले क्या कहेंगे? सोसाइटी के लोग क्या कहेंगे? बराबर वालों में नाक कट जाएगी? पास पड़ोस वाले हसेगे की इनके यहां भगवान का दिया हुआ सब कुछ है फिर भी देखो गरीबों की तरह दिया जला रहे हैं, बड़ी बदनामी हो जाएगी !
देखिए भाई पूजा तो शान का त्यौहार है जितना दिखा सके दिखाइए देवी देखेगी तो कृपा बरसेगी ही इसी लिये दिखावे में कोई कमी नहीं आनी चाहिए।
तो कैंडल जलाईए, चाइनीज लाइट लगाये, जमीन पर रंगोली बनाने की जहमत मत उठाइए सबसे अच्छा प्लास्टिक की पन्नी वाली चमकीली रंगोली चिपका दिजीये जो आपके घर की शोभा बढ़ाने के साथ लंबा चलेगा भी ।
चलो उस कविता वाली बात पर आते हैं घर पर इस कविता को लिखने वाले कवि उस समय के वर्तमान स्थिति में रहकर कविता लिखे होंगे तब जब बिजली की समुचित व्यवस्था नहीं थी नाही बाजार में सस्ते चाइनीज लाइट्स उपलब्ध थे. रंगोली तो गुलाल से जमीन पर बनाए जाते थे और दूसरे ही दिन छूमंतर हो जाते थे। समान समय में कविता को थोड़ा मॉडिफाई करने की जरूरत है मेरे अनुसार कुछ ऐसा होना चाहिए लाइट लगाओ लाइट लगाओ आज दिवाली रे
जमीन में तुम रंगोली चिपकाओ आज दिवाली रे
खूब पिज्जा और बर्गर खाओ आज दिवाली रे...
आप सोंच रहे होंगे की ये उलटी बांसुरी क्यों बजा रहा हूँ मैं तो साहब इसके जवाब में मैं आपको बता देता हूँ की ये कटाक्ष है उन देशभक्तो पर जो अपने त्यौहार को मनाने के लिए दुश्मन देश चीन के सामान को तवज्जो देते है, वे चीनी दिये, लाइट्स लगाकर अपने परंपरा का निर्वहन करना चाहते हैं. जो देश को खोखला किये जा रहा है एक तरफ कुम्हार अपने चाक छोड़ बेरोजगारों के कतार में खड़ा हो रहे है, तो वहीं चीन हमारे पैसों से रोजगार पाकर हमें ही आँखे दिखा रहा है। सम्भल जाइये आप दीपावली में प्रकाश तो कर लेंगे लेकिन कही न कही कालिख अपने देश में गिरेगा।।।।
कुमार अभय
यह वाली कविता तो सुने होंगे आप इसमें कवि कहना चाहता है कि आप दीपावली में दीपक यानी दिया जलाएं। मुझे लगता है कि यह कविता थोड़ी old-fashioned हो गई है और वर्तमान समय के खाचे में फिट नहीं बैठती जरा आप ही सोचिए की आज के जमाने में कौन दिया जलाता है भाई ? वो भी मिट्टी का? धन की देवी लक्ष्मी के पूजा में मिट्टी का दिया जलाना थोड़ा ऑड सा लगता है। इस से इम्प्रेशन मैं बट्टा भी लग जाएगा। महालक्ष्मी क्या सोचेंगी कि इसको इतना धन संपदा दिया है और यह मेरी ही पूजा में मिट्टी के दीपक जला मेरा भक्त मेरे साथ बेमानी कर रहा है। देवी अगर एक बार सैड हो गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे!
यह बात सोच कर ही रूह कांप जाती है की पड़ोस वाले क्या कहेंगे? सोसाइटी के लोग क्या कहेंगे? बराबर वालों में नाक कट जाएगी? पास पड़ोस वाले हसेगे की इनके यहां भगवान का दिया हुआ सब कुछ है फिर भी देखो गरीबों की तरह दिया जला रहे हैं, बड़ी बदनामी हो जाएगी !
देखिए भाई पूजा तो शान का त्यौहार है जितना दिखा सके दिखाइए देवी देखेगी तो कृपा बरसेगी ही इसी लिये दिखावे में कोई कमी नहीं आनी चाहिए।
तो कैंडल जलाईए, चाइनीज लाइट लगाये, जमीन पर रंगोली बनाने की जहमत मत उठाइए सबसे अच्छा प्लास्टिक की पन्नी वाली चमकीली रंगोली चिपका दिजीये जो आपके घर की शोभा बढ़ाने के साथ लंबा चलेगा भी ।
चलो उस कविता वाली बात पर आते हैं घर पर इस कविता को लिखने वाले कवि उस समय के वर्तमान स्थिति में रहकर कविता लिखे होंगे तब जब बिजली की समुचित व्यवस्था नहीं थी नाही बाजार में सस्ते चाइनीज लाइट्स उपलब्ध थे. रंगोली तो गुलाल से जमीन पर बनाए जाते थे और दूसरे ही दिन छूमंतर हो जाते थे। समान समय में कविता को थोड़ा मॉडिफाई करने की जरूरत है मेरे अनुसार कुछ ऐसा होना चाहिए लाइट लगाओ लाइट लगाओ आज दिवाली रे
जमीन में तुम रंगोली चिपकाओ आज दिवाली रे
खूब पिज्जा और बर्गर खाओ आज दिवाली रे...
आप सोंच रहे होंगे की ये उलटी बांसुरी क्यों बजा रहा हूँ मैं तो साहब इसके जवाब में मैं आपको बता देता हूँ की ये कटाक्ष है उन देशभक्तो पर जो अपने त्यौहार को मनाने के लिए दुश्मन देश चीन के सामान को तवज्जो देते है, वे चीनी दिये, लाइट्स लगाकर अपने परंपरा का निर्वहन करना चाहते हैं. जो देश को खोखला किये जा रहा है एक तरफ कुम्हार अपने चाक छोड़ बेरोजगारों के कतार में खड़ा हो रहे है, तो वहीं चीन हमारे पैसों से रोजगार पाकर हमें ही आँखे दिखा रहा है। सम्भल जाइये आप दीपावली में प्रकाश तो कर लेंगे लेकिन कही न कही कालिख अपने देश में गिरेगा।।।।
कुमार अभय

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