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Monday, December 15, 2025

उम्र बढ़ रही है, संघर्ष जारी है, तजुर्बा भी बढ़ना चाहिए था.



Aawara kalam
उम्र बढ़ रही है, संघर्ष जारी है, तजुर्बा भी बढ़ना चाहिए था , जो मुझे नहीं लगता है कि बढ़ रहा है। दिन प्रतिदिन जुड़कर सप्ताह, सप्ताह से महीना और महीने साल होते जा रहे हैं और जिंदगी के तीसों साल गुजर गए। पीछे झांकने पर लगता है कि बहुत कुछ हो जाना चाहिए था जो अभी तक नहीं हुआ। मुझे किसी ऐसी जगह पहुंचाना चाहिए था जहां जिंदगी का रास्ता आसान हो जाता लेकिन मजाल है, हो जाए। चुनौती हौसले पर हंसती नजर आती है। कभी कभार गुस्से से तिलमिला उठता हूँ।

हार, फिर हार और लगातार हारना भी मुझे अभ्यस्त बना रहा है कि मैं आदि हो जाऊंगा की हारना बुरा नहीं लगे और मैं धीरे-धीरे जीतने की कोशिश भी त्याग दूं। सब कहते हैं उम्मीद जिंदा रहनी चाहिए जरूरी होता है जीने के लिए। लेकिन इतनी उम्र तक जीने के बाद यह बातें खोखले लगने लगते हैं।

क्या कर रहा हूँ? क्यों कर रहा हूँ ? पता नहीं चल रहा है। लेकिन हाँ, चल रहा हूँ हवाओं के इशारों में... जिधर चल रही है, उधर चला जा रहा हूँ। पहले तो रुक कर सोंचता था यह करना था, यह नहीं करना। अब तो बस चीज़ें होती जा रही हैं। चाहे जो भी हो, अच्छा तो नहीं कह सकते पर कौन सोंच विचार करे। क्या? क्यों? कैसे? जो होना है होगा। अब इसी सिद्धांत पर सर टिका कर निश्चित हूँ।
कुछ दिनों से मैं खुद में एक बदलाव देख रहा हूं पहले साथ के लोगों के आगे बढ़ने पर खुश होता था। लेकिन अब देखता हूँ कि मैं जब छोटी-छोटी चीजों को पूरा नहीं कर पाता हूं तो मुझे साथ के लोगों पर जलन सी होने लगी है। मैं महसूस कर रहा हूं कि जिसके साथ में कभी ऊंचे आवाज में बात नहीं करता था। उनके साथ मेरा बर्ताव बिगड़ रहा है, और बेहद रूखा हो गया हूँ। लोगों से दूरी बन रही है। वो लोग पीछे छूट रहे हैं या फिर आगे चले जा रहे हैं पता नहीं, जिनसे यह बात की जा सकती थी । 
  अब वो बातें कहां की जाए तो सोचा लिख देते हैं। क्योंकि यही वह जगह है जहां बातें की जा सकती हैं। अपनी बातें बताई जा सकती हैं। यहां यह सहूलियत तो होगी कि मेरे हार वाली बातों पर कोई हंसेगा नहीं, यहां मुझे बातें बताते हुए या लिखते हुए कोई संकोच नहीं होगा। 

मुझे लगता है की बातें बता देने से या लिख देने से आपकी नकारात्मकता दुख निकल जाता है और आप अगला दिन जीने के लिए तैयार हो जाते हैं। आपके साथ राज साझा करने के पीछे मेरा एक मानना यह है कि यहां मेरे राज सुरक्षित रहेंगे बिना किसी डर के, बिना किसी भय के, की कोई मुझ पर हंसेगा। 

खैर अब तक की लिखी बातें मैं भावनाओं के आवेग में बहकर लिख दिया हूँ इसमें क्या लिखा गया है नहीं पता की ये सही है, गलत है, गड़बड़ है यह आप देख लीजिएगा... इसका कोई अर्थ निकलेगा, नहीं निकलेगा यह भी नहीं जानता। बस एक बात पता है कि अब हमारी बातें लिखी जाती रहेंगी।

आपका अभय।

Tuesday, May 19, 2020

और बुरा हूं मैं !

मुझे अब उसके साथ होना चाहिए जब उसे मेरी जरूरत है मैं यह नहीं चाहता कि उसे जरा भी महसूस हो की उसे जब मेरी सख्त जरूरत थी तब मैं उसके साथ नहीं था. मुझे इस बात का डर है के लोगों का कहा वह बात सच ना हो जाए की इंसान को वह व्यक्ति ही मुसीबत में काम नहीं आता जिस पर वो सबसे ज्यादा भरोसा करता है यह बुरे दिन है तो बीत जाएंगे लेकिन एक सफेद और मखमली दामन पर लगा काला बदनुमा धब्बा छोड़ जाएंगे। पूरी उम्र के लिए जिसे देख हर किसी का किसी विश्वासपात्र के ऊपर से विश्वास डगमगाने लगेगा। बहुत बुरा होता है किसी का किसी पर से विश्वास उठ जाना। बुरा होता है बुरे वक्त में हम जितने अच्छा मानते हैं उनका साथ नहीं होना। आज मेरा उसके साथ नहीं होना भरोसे को सही या गलत के तराजू में रखकर तोला जाएगा। जब हर तरफ रिश्ते भरोसा खोते जा रहे हो वहां एक और विश्वास का दम घुट जाना बुरा है। उसने तो कभी नहीं कहा था कि मेरी अच्छाइयों के बदले तुम मुझे मेरे बुरे वक्त के अंधेरे में रोशनी बनकर खड़े रहना। नहीं कहा था उसने जब चारों तरफ अविश्वास का अंधेरा मेरे तरफ बढ़ेगा, उस समय में तुम पर आंख बंद करके भरोसा कर लूंगा और तुम मुझे संभाल लोगे, इस भरोसे का टूट जाना बुरा है और बुरा हूं जो इस बुरे वक्त में बुरा बन बैठा हूं। 


Sunday, April 30, 2017

कुछ पंक्तियाँ दोस्तों के नाम

बड़े दिनों बाद लिख रहा हूँ... कुछ पंक्तियाँ दोस्तों के नाम।
आशा करता हूँ आपसे वही प्यार मिलेगा जैसा आप मुझे हमेशा से देते आये हैं। इस कविता की शुरुआत मैंने अपने शहर के चाय केंद्र से की है जहाँ हम दोस्तों के मिलने का केंद्र स्थल होता है। इस जगह हम दोस्त मिलकर अपने हफ़्ते भर के थकन, और परेशानियों को मुँह चिढ़ाते हैं। 

नया मोड़ की चाय हो,
साथ में अपने भाय हों
लाईफ अपनी कुल गाय सी
मुसीबत भले कसाई हो

बस संग में अपने भाई हो...
दो बातें तेरे मन की
कुछ शरारत बचपन की
तु संग ही सब मस्ती अपनी
चाहे दिनभर ना कमाई हो

संग में अपने भाई हो...
सावन ना आए बात नहीं
पतझड़ ही बस आने दो
ऐसे ही हंसते रहना तुम
चाहे लाख तुफानें आई हों
कोई संग भले न हों

संग में अपने भाई हों ...
तुम हो तो खुदा अपना
तुम ही हो, तो खुदाई हो
तेरे रिश्ते की कैद भली है
ताउम्र भले ना रिहाई हो
जब कुछ भी अपनी हो न हो

बस संग में अपने भाई हों
सब कुछ अधुरा सा लगे
बुलंदी भी जैसे खाई हो
सब रूठे तुम ना रूठे
उम्र भर ना जुदाई है
सब कुछ छीन ऐ जिंदगी

बस संग में अपने भाई हों...
मिलिए मेरी मित्र मंडली से 🔺⥣

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ...

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ... एक जादूगर जादू करता था, तितली को कबूतर, कबूतर को बाज़ और बाज़ को मोर बना देता था। ...