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Sunday, January 23, 2022

छोटू और गणतंत्र दिवस

गणतंत्र दिवस के आने में केवल दो दिन बचे थे | हमारे पड़ोस में रहने वाला छोटू बाबू ज़रा परेशान दिखाई देता था | झंडा ऊँचा रहे हमारा, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, उसके होंठ बार बार इसी गीत को दोहरा रहे थे, चेहरे पर कोई भाव नहीं दिखाई देते थे |

मेरे पूछने पर छोटू बाबू ने अपनी व्यथा बतायी | कहा, स्कूल में झंडा फहराया जाएगा तो सभी बच्चो को झंडा लेकर जाना है, सभी छात्रों को सफ़ेद यूनिफार्म में आना है, जो दूध सा सफ़ेद हो और उसकी क्रीज़ न उतरी हो | आगे कहा, आप जानते हैं के उस दिन मिठाई भी बंटेगी और छुट्टी भी जल्दी होगी | हमारी प्रिंसिपल मैडम ने कहा है के सबको अपने अपने गार्डियन के साथ आना है, क्या आप मेरे साथ चलोगे? मैंने भी हामी भर दी मगर फिर भी उसके चेहरे के भाव नहीं बदले | मेरे पूछने पर उसने बताया के उसे गणतंत्र दिवस पर एक भाषण देना है मगर उसके कुछ भी पता नहीं है | मैंने उसे भाषण लिख कर देने का आश्वासन दिया जिससे छोटू की बांछें खिल गयीं |

भाषण का दिन आ गया, सुबह से ही देशभक्ति के गीत अलग अलग जगहों पर बजने शुरू हो गए | सड़कें साफ़ होती रहीं, और लोग अपनी दुकानों के सामने झंडे लगाते गए | मैं वादे के मुताबिक छोटू के साथ उसके स्कूल कि तरफ चल पड़ा | कहीं दूर सारे जहां से अच्छा, हिन्दोस्तांन हमारा बज रहा था | मैं भी वही धुन गुनगुनाता हुआ आगे बढ़ता रहा | हम स्कूल पहुँच गए, और आखिर वो वक़्त आ गया जिसका इंतज़ार छोटू दो दिनों से कर रहा था | स्टेज पर चढ़ कर उसने भाषण देना शुरू किया |

"भारत को आज़ादी मिलने के बाद देश में बड़ी समस्या यह आयी कि देश को चलाया कैसे जाए? देश कि विधि व्यवस्था, शासन, क़ानून व्यवस्था का क्या होगा? इतने बड़े और विविध देश का संचालन कैसे होगा? पूरे देश के लोगो को एक व्यवस्था में कैसे समाहित किया जाएगा? देश के बड़े बुद्धिजीविओं के लिए यह एक बड़ी समस्या थी | 

एक कवि ने कहा है, "प्रीत करे तो ऐसी करें, जैसे लौटा डोर! गर्दन नार फंसाए के, लाए नीर झकोर" इसका अर्थ यह होता है जब तक इंसान के पास सोचने कि शक्ति रहेगी तब तक वह अपने सूझबूझ से हर समस्या का समाधान निकाल ही लेगा। फिर गणमान्य लोगों ने यह निर्णय लिया कि देश को चलाने के लिए एक कानून व्यवस्था बनायी जायेगी जिसका ज़िम्मा बाबा भीमराव अंबेडकर को सौंपा गया । 2 साल 11 महीना 18 दिनों में बाबा ने विद्वानों के साथ मिलकर देश का संविधान तैयार किया ।
26 जनवरी सन 1950 को हमारा देश भारत, गणतंत्र देशों की श्रेणी में आकर खड़ा हुआ था। उद्देश्य एक मात्र था कि हमारा देश कुशल तरीके से चले और सफलता की बुलंदियों पर आसीन रहे।

आज के ही दिन हम लोग झंडा फहरा कर अपने देश भारत को आजादी दिलाने वाले सभी वीर सपूतों को याद करते हैं और उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। बस इतना ही कह कर मैं अपनी वाणी को विराम देता हूं। जय हिंद... जय भारत... वंदे मातरम"

मेरे लिखे भाषण को छोटू ने बड़े ही ओजस्वी तरीके से प्रस्तुत किया | स्कूल ग्राउंड तालियों कि गड़गड़ाहट से गूँज उठा | मेरी भी छाती गर्व से फूली जाती थी के मेरे लिखे भाषण को उस बच्चे ने यादगार बना दिया | सारे कार्यक्रम विधिवत पूरे हुए, मेरे हाथ में झंडा पकड़कर छोटू बड़े चाव से लड्डू खा रहा था | अपने हाथ अपनी ही पैंट पे पोछकर छोटू ने मेरे हाथ से झंडा लिया और दुसरे हाथ से मेरी ऊँगली पकड़ ली | हम दोनों घर कि ओर बढ़ रहे थे, मेरे क़दम कुछ धीमे थे, और छोटू हवाओं पर पैर रखता हुआ चल रहा था | 

चलते चलते छोटू अचानक से ठिठका और उसने मुझसे पूछा, भैय्या ये संविधान क्या चीज़ है?
मेरे चेहरे पर एक हलकी मुस्कान तैर गयी, "संविधान एक क़ानून कि किताब होती है, जिसको पढ़कर पढ़े-लिखे लोग देश चलाते हैं "

देश कौन चलाता है? छोटू ने आँखें बड़ी करते हुए पुछा|

"देश में रहने वाले लोग" मैंने कहा |

"मैं भी तो इसी देश में रहता हूँ, मैं तो देश नहीं चलता" उसने मुंह ऐंठकर कहा|

मैं एक पल को थमा, "जैसे तुम अच्छे से पढाई करते हो, सभी का कहना मानते हो, झूट नहीं बोलते, वैसे ही हम सब लोग अपना अपना काम करते हैं और इसी तरह से देश चलता है|"

"पर...मेरे दोस्त तो कहते हैं कि देश मंत्री चलते हैं | क्या वो भी मेरी तरह पढाई करते हैं, क्या वो भी कभी झूट नहीं बोलते?" छोटू कि जिज्ञासा ख़त्म ही नहीं हो रही थी |

"हाँ बेटा वो भी खूब पढ़ाई करते हैं और मंत्री बनते हैं, फिर देश को आगे ले जाने के लिए काम करते हैं" मैंने छोटू से नज़रें चुराते हुए कहा | मुझे इक झूठ का सहारा लेकर उसकी ज्वलंत जिज्ञासा पर पानी डालना पड़ा | छोटू चुप हो गया, शायद उसे उसके जवाब मिल गए थे | मगर चुप तो मैं भी था, पर मेरे मन में न जाने कितने सवाल उत्पन्न होने लगे | छोटू कि चुप्पी में संतोष था, और मेरी चुप्पी में एक फांस थी, जो मुझे अंदर अंदर चुभ रही थी | 

"काश के हमारे देश के नेता भी पढ़े लिखे व नैतिकतावादी होते तो देश कि स्थिति कुछ और ही होते"| यही सोचते हुए हम घर कि ओर बढ़ते रहे | कहीं दूर सारे जहां से अच्छा, हिंदुस्तान हमारा अभी भी बज रहा था |

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ...

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ... एक जादूगर जादू करता था, तितली को कबूतर, कबूतर को बाज़ और बाज़ को मोर बना देता था। ...