I m Back friends...
Thursday, January 29, 2015
Wednesday, September 10, 2014
guruvar ke kalam se....
=============मुहब्बत================
उसी की आहटों को सुन मेरी धड़कन चहकती है,
उसी चेहरे पे ख्वाबों में मेरी तबियत बहकती है।
मेरे होठों को चुपके से छुआ था भीड़ में जिसने,
उसी आँचल की खुशबू से मेरी साँसे महकती है।
उसी की आहटों को सुन मेरी धड़कन चहकती है,
उसी चेहरे पे ख्वाबों में मेरी तबियत बहकती है।
मेरे होठों को चुपके से छुआ था भीड़ में जिसने,
उसी आँचल की खुशबू से मेरी साँसे महकती है।
रखा है क्या जो चाहत में मचलने की ज़रूरत है,
मुहब्बत की रवायत में क्यूँ जलने की ज़रूरत है।
ये परवाने फनाँ होते शमाँ की आशिकी में क्यूँ,
सबब ये है वो शम्माएँ भी तुमसी खूबसूरत है।
==================================
मुहब्बत की रवायत में क्यूँ जलने की ज़रूरत है।
ये परवाने फनाँ होते शमाँ की आशिकी में क्यूँ,
सबब ये है वो शम्माएँ भी तुमसी खूबसूरत है।
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Thursday, December 26, 2013
गंगा अभी खुद ही बदलने को तैयार नहीं है.
"तू 'गंगा' तो नहीं है न ? मैली गंगा को साफ़ करने के कितने सारे जतन कर लिए गए.. कुछ नहीं हुआ. गंगा आज भी मैली है.
पर ऐसा नहीं है कि गंगा साफ हो ही नहीं सकती.
आज अपना रास्ता बदल ले गंगा .. सब साफ हो जायेगा. मगर वह बदलेगी नहीं .. आदत हो गयी है उसकी मैल के साथ जीने की. तब?
फिर भी साफ हो सकती है. जानना चाहेंगी कैसे ?
अभी उसका उदगम स्थल 'हिमालय' भरभरा का गिर पड़े तो उसका रास्ता खुद बदल जायेगा. रास्ता बदलेगा तो युगों से जमीं गन्दगी भी उसके तांडव-प्रवाह में नेस्तनाबूद हो जायेगी. साथ में सारी छोटी नदियां भी राह बदलेंगी.
हिमालय के गिरने पर विनाश और नया सृजन अवश्यम्भावी है .. मेरे गिरने पर नहीं.
क्योंकि मेरी गंगा अभी खुद ही बदलने को तैयार नहीं है."
- नए साल की पूर्व-संध्या में 'तथागत' के जन्म के बाद पुरुष के दृष्टिकोण से दुनिया को देख कर क्यों न कुछ लिखा जाये?
पर ऐसा नहीं है कि गंगा साफ हो ही नहीं सकती.
आज अपना रास्ता बदल ले गंगा .. सब साफ हो जायेगा. मगर वह बदलेगी नहीं .. आदत हो गयी है उसकी मैल के साथ जीने की. तब?
फिर भी साफ हो सकती है. जानना चाहेंगी कैसे ?
अभी उसका उदगम स्थल 'हिमालय' भरभरा का गिर पड़े तो उसका रास्ता खुद बदल जायेगा. रास्ता बदलेगा तो युगों से जमीं गन्दगी भी उसके तांडव-प्रवाह में नेस्तनाबूद हो जायेगी. साथ में सारी छोटी नदियां भी राह बदलेंगी.
हिमालय के गिरने पर विनाश और नया सृजन अवश्यम्भावी है .. मेरे गिरने पर नहीं.
क्योंकि मेरी गंगा अभी खुद ही बदलने को तैयार नहीं है."
- नए साल की पूर्व-संध्या में 'तथागत' के जन्म के बाद पुरुष के दृष्टिकोण से दुनिया को देख कर क्यों न कुछ लिखा जाये?
गाँधी का दोष रहा होगा...
जिन्ना की भूख रही होगी, गाँधी का दोष रहा होगा!!!
अब कोई सपना ना देखे, ये धरती बाँट ली जायेगी
जो पाकिस्तान पुकारेगी, वो जीभ काट ली जायेगी
जिनको भी मेरे भारत की धरती से प्यार नहीं होगा,
उनको भारत में रहने का कोई अधिकार नहीं होगा
धरती से अम्बर से कहना, हर ताल समंदर से कहना
कहना कारगिल की घाटी से, गोहाटी से चौपाटी से ,
ख़ूनी परिपाटी से कहना, दुश्मन की माटी से कहना
कहना लोभी, मक्कारों से जासूसी करने वालों से,
जो मेरा आँगन तोड़ेगी वो बाँह तोड़ दी जाएगी,
जो आँख उठेगी भारत पर वो आँख फोड़ दी जाएगी,
सैंतालिस का बंटवारा भी कोई अंधा रोष रहा होगा
जिन्ना की भूख रही होगी, गाँधी का दोष रहा होगा,
जो भूल हुई हमसे पहले, वो भूल नहीं होने देंगे
हम एक इंच धरती भारत से अलग नहीं होने देंगे
जो सीमा पार पड़ोसी है उसको तो क्या समझाना है
वो बंटवारे का रोगी है उसका ये रोग पुराना है
लेकिन रावलपिंडी पहले अपने दामन में तो झाँके
अपने घर का आलम देखे मेरे आँगन में ना ताके
भारत में दखलंदाजी की तो पछताना पड़ जायेगा
रावलपिंडी, लाहौर, कराँची तक भारत कहलायेगा !!!
Sunday, December 15, 2013
Tuesday, December 10, 2013
चांद से फूल से या मेरी ज़ुबाँ से सुनिये...
चांद
से फूल से
या मेरी ज़ुबाँ
से सुनिए
हर तरफ आपका क़िस्सा हैं जहाँ से सुनिए
सबको आता नहीं दुनिया को सता कर जीना
ज़िन्दगी क्या है मुहब्बत की ज़बां से सुनिए
क्या ज़रूरी है कि हर पर्दा उठाया जाए
मेरे हालात भी अपने ही मकाँ से सुनिए
मेरी आवाज़ ही पर्दा है मेरे चेहरे का
मैं हूँ ख़ामोश जहाँ, मुझको वहाँ से सुनिए
कौन पढ़ सकता हैं पानी पे लिखी तहरीरें
किसने क्या लिक्ख़ा हैं ये आब-ए-रवाँ से सुनिए
चांद में कैसे हुई क़ैद किसी घर की ख़ुशी
ये कहानी किसी मस्ज़िद की अज़ाँ से सुनिए
हर तरफ आपका क़िस्सा हैं जहाँ से सुनिए
सबको आता नहीं दुनिया को सता कर जीना
ज़िन्दगी क्या है मुहब्बत की ज़बां से सुनिए
क्या ज़रूरी है कि हर पर्दा उठाया जाए
मेरे हालात भी अपने ही मकाँ से सुनिए
मेरी आवाज़ ही पर्दा है मेरे चेहरे का
मैं हूँ ख़ामोश जहाँ, मुझको वहाँ से सुनिए
कौन पढ़ सकता हैं पानी पे लिखी तहरीरें
किसने क्या लिक्ख़ा हैं ये आब-ए-रवाँ से सुनिए
चांद में कैसे हुई क़ैद किसी घर की ख़ुशी
ये कहानी किसी मस्ज़िद की अज़ाँ से सुनिए
Nida Fazli
Tuesday, November 26, 2013
फिर मन्दिर को कोई ‘मीरा’ दीवानी दे मौला
नमस्कार साथियों,
मै पांच दिनों से आपके बीच अनुपस्थित रहा इस अछम्य अपराध के लिए माफ़ी चाहुंगा !
हालाँकि मैं ये समझता हुँ कि आपका आशीर्वाद मुझ पे हमेशा कि तरह बरकरार रहेगा !
निदा फ़ाज़ली साहब को आज पढ़ने का सौभाग्य मिला . अनुभव साझा कर हूँ …
मै पांच दिनों से आपके बीच अनुपस्थित रहा इस अछम्य अपराध के लिए माफ़ी चाहुंगा !
हालाँकि मैं ये समझता हुँ कि आपका आशीर्वाद मुझ पे हमेशा कि तरह बरकरार रहेगा !
निदा फ़ाज़ली साहब को आज पढ़ने का सौभाग्य मिला . अनुभव साझा कर हूँ …
गरज-बरस प्यासी धरती पर
फिर पानी दे मौला
चिड़ियों को दाने, बच्चो को
गुड़धानी दे मौला
दो और दो का जोड़ हमेशा
चार कहाँ होता है
सोच-समझवालों को थोड़ी
नादानी दे मौला
फिर रौशन कर ज़हर का प्याला
चमका नयी सलीबें
झूठों की दुनिया में सच को
ताबानी1 दे मौला
फिर मूरत से बाहर आकर
चारों ओर बिखर जा
फिर मन्दिर को कोई ‘मीरा’
दीवानी दे मौला
तेरे होते कोई किसी की
जान का दुश्मन क्यों हो
जीनेवालों को मरने की
आसानी दे मौला
फिर पानी दे मौला
चिड़ियों को दाने, बच्चो को
गुड़धानी दे मौला
दो और दो का जोड़ हमेशा
चार कहाँ होता है
सोच-समझवालों को थोड़ी
नादानी दे मौला
फिर रौशन कर ज़हर का प्याला
चमका नयी सलीबें
झूठों की दुनिया में सच को
ताबानी1 दे मौला
फिर मूरत से बाहर आकर
चारों ओर बिखर जा
फिर मन्दिर को कोई ‘मीरा’
दीवानी दे मौला
तेरे होते कोई किसी की
जान का दुश्मन क्यों हो
जीनेवालों को मरने की
आसानी दे मौला
Friday, November 15, 2013
तेरा प्यार भी कुाबूल नहीं
सुबह रात्रि मित्रों , हालाँकि ये आपके लिए सुबह हो गई है क्या करूँ आदत से मज़बूर हूँ। बॉयय्य्य्य
जाते-जाते। …
खैरात में तो तेरा प्यार भी कुाबूल नहीं।
Thursday, November 14, 2013
जब खड़े होगे अकेले...
सुप्रभात दोस्तों आपके सामने खुद पंक्तियाँ प्रस्तुत है,
जिसे मैंने एक दोस्त के कहने पे लिखा था।
अपनी राय जरूर दें …
जब खड़े होगे अकेले
साथ मुझे पाओगे !
यादों के झरोखे में,
रोते ही जाओगे.…
हर कोई होगा साथ,
खुद को अकेला पाओगे।
आँसू आखों से छलकेंगे,
और तुम डूबते जाओगे।
जब किसी को याद
कर-कर के बुलाओगे,
चेहरा तो खुश होगा,
आखों को रुलाओगे !
तकलीफें छोटी हो जायेगी।
वजह तेरे जब भी किसी
भूखे को रोटी हो जायेगी !
रखना यकीं इरादों पे,
इतना अपने, और देखना
आप बड़े हो जाओगे
सपने छोटी हो जायेगी !
मेरे ख्यालों में जो]
खुद को उलझाओगे,
उलझते ही चले जाओगे …
तुम मुझे भूल भी जाओ शायद ?
मेरे शब्दों को भूल न पाओगे …
…निशब्द अभय
जिसे मैंने एक दोस्त के कहने पे लिखा था।
अपनी राय जरूर दें …
जब खड़े होगे अकेले
साथ मुझे पाओगे !
यादों के झरोखे में,
रोते ही जाओगे.…
हर कोई होगा साथ,
खुद को अकेला पाओगे।
आँसू आखों से छलकेंगे,
और तुम डूबते जाओगे।
जब किसी को याद
कर-कर के बुलाओगे,
चेहरा तो खुश होगा,
आखों को रुलाओगे !
तकलीफें छोटी हो जायेगी।
वजह तेरे जब भी किसी
भूखे को रोटी हो जायेगी !
रखना यकीं इरादों पे,
इतना अपने, और देखना
आप बड़े हो जाओगे
सपने छोटी हो जायेगी !
मेरे ख्यालों में जो]
खुद को उलझाओगे,
उलझते ही चले जाओगे …
तुम मुझे भूल भी जाओ शायद ?
मेरे शब्दों को भूल न पाओगे …
…निशब्द अभय
Tuesday, November 12, 2013
परिंदो को आकाश दे दो…
मैंने आज कुछ लिखने का मन हुआ और मैंने कलम उठाया और लिख डाली,
आलोचनायें आमंत्रित हैं …
नहीं रोयेंगी कोई आँखे,
मुझे विश्वास दे दो !
सारी ज़मीं तुम रखलो,
मुझे आकाश दे दो …
बहुत हो चुकी तकरारें !
बहुत बन चुकी दीवारें !
तोड़ कर सारी सरहदें,
परिंदो को आकाश दे दो…
ग़म सबके कम हो जाएँ ,
अधरों को मुस्कान मिले !
ले आओ सबकी तकलीफें,
सब-के-सब मेरे पास दे दो…
हीरे-मोती कब माँगा मै ?
एक एहसान कर मौला !
ज़मीर जिनके मर चुके,
उन लाशों में जान दे दो .…
… निशब्द अभय
आलोचनायें आमंत्रित हैं …
नहीं रोयेंगी कोई आँखे,
मुझे विश्वास दे दो !
सारी ज़मीं तुम रखलो,
मुझे आकाश दे दो …
बहुत हो चुकी तकरारें !
बहुत बन चुकी दीवारें !
तोड़ कर सारी सरहदें,
परिंदो को आकाश दे दो…
ग़म सबके कम हो जाएँ ,
अधरों को मुस्कान मिले !
ले आओ सबकी तकलीफें,
सब-के-सब मेरे पास दे दो…
हीरे-मोती कब माँगा मै ?
एक एहसान कर मौला !
ज़मीर जिनके मर चुके,
उन लाशों में जान दे दो .…
… निशब्द अभय
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अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ...
अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ... एक जादूगर जादू करता था, तितली को कबूतर, कबूतर को बाज़ और बाज़ को मोर बना देता था। ...
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अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ... एक जादूगर जादू करता था, तितली को कबूतर, कबूतर को बाज़ और बाज़ को मोर बना देता था। ...
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दीप जलाओ दीप जलाओ आज दिवाली रे .. यह वाली कविता तो सुने होंगे आप इसमें कवि कहना चाहता है कि आप दीपावली में दीपक यानी दिया जलाएं। मुझे लगता...




