| Aawara kalam |
उम्र बढ़ रही है, संघर्ष जारी है, तजुर्बा भी बढ़ना चाहिए था
, जो मुझे नहीं लगता है कि बढ़ रहा है। दिन प्रतिदिन जुड़कर सप्ताह, सप्ताह से महीना और महीने साल होते जा रहे हैं और जिंदगी के तीसों साल गुजर गए। पीछे झांकने पर लगता है कि बहुत कुछ हो जाना चाहिए था जो अभी तक नहीं हुआ। मुझे किसी ऐसी जगह पहुंचाना चाहिए था जहां जिंदगी का रास्ता आसान हो जाता लेकिन मजाल है, हो जाए। चुनौती हौसले पर हंसती नजर आती है। कभी कभार गुस्से से तिलमिला उठता हूँ।
हार, फिर हार और लगातार हारना भी मुझे अभ्यस्त बना रहा है कि मैं आदि हो जाऊंगा की हारना बुरा नहीं लगे और मैं धीरे-धीरे जीतने की कोशिश भी त्याग दूं। सब कहते हैं उम्मीद जिंदा रहनी चाहिए जरूरी होता है जीने के लिए। लेकिन इतनी उम्र तक जीने के बाद यह बातें खोखले लगने लगते हैं।
कुछ दिनों से मैं खुद में एक बदलाव देख रहा हूं पहले साथ के लोगों के आगे बढ़ने पर खुश होता था। लेकिन अब देखता हूँ कि मैं जब छोटी-छोटी चीजों को पूरा नहीं कर पाता हूं तो मुझे साथ के लोगों पर जलन सी होने लगी है। मैं महसूस कर रहा हूं कि जिसके साथ में कभी ऊंचे आवाज में बात नहीं करता था। उनके साथ मेरा बर्ताव बिगड़ रहा है, और बेहद रूखा हो गया हूँ। लोगों से दूरी बन रही है। वो लोग पीछे छूट रहे हैं या फिर आगे चले जा रहे हैं पता नहीं, जिनसे यह बात की जा सकती थी ।
अब वो बातें कहां की जाए तो सोचा लिख देते हैं। क्योंकि यही वह जगह है जहां बातें की जा सकती हैं। अपनी बातें बताई जा सकती हैं। यहां यह सहूलियत तो होगी कि मेरे हार वाली बातों पर कोई हंसेगा नहीं, यहां मुझे बातें बताते हुए या लिखते हुए कोई संकोच नहीं होगा।
मुझे लगता है की बातें बता देने से या लिख देने से आपकी नकारात्मकता दुख निकल जाता है और आप अगला दिन जीने के लिए तैयार हो जाते हैं। आपके साथ राज साझा करने के पीछे मेरा एक मानना यह है कि यहां मेरे राज सुरक्षित रहेंगे बिना किसी डर के, बिना किसी भय के, की कोई मुझ पर हंसेगा।
खैर अब तक की लिखी बातें मैं भावनाओं के आवेग में बहकर लिख दिया हूँ इसमें क्या लिखा गया है नहीं पता की ये सही है, गलत है, गड़बड़ है यह आप देख लीजिएगा... इसका कोई अर्थ निकलेगा, नहीं निकलेगा यह भी नहीं जानता। बस एक बात पता है कि अब हमारी बातें लिखी जाती रहेंगी।
आपका अभय।
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