Tuesday, November 26, 2013

फिर मन्दिर को कोई ‘मीरा’ दीवानी दे मौला

नमस्कार साथियों,
                        मै पांच दिनों  से आपके बीच अनुपस्थित  रहा इस  अछम्य अपराध के लिए माफ़ी चाहुंगा !
हालाँकि मैं ये समझता हुँ  कि आपका आशीर्वाद मुझ पे हमेशा कि तरह बरकरार रहेगा !
निदा फ़ाज़ली साहब को आज पढ़ने का सौभाग्य मिला . अनुभव  साझा कर   हूँ  …

गरज-बरस प्यासी धरती पर
फिर पानी दे मौला
चिड़ियों को दाने, बच्चो को
गुड़धानी दे मौला

दो और दो का जोड़ हमेशा
चार कहाँ होता है
सोच-समझवालों को थोड़ी
नादानी दे मौला

फिर रौशन कर ज़हर का प्याला
चमका नयी सलीबें
झूठों की दुनिया में सच को
ताबानी1 दे मौला

फिर मूरत से बाहर आकर
चारों ओर बिखर जा
फिर मन्दिर को कोई ‘मीरा’
दीवानी दे मौला

तेरे होते कोई किसी की
जान का दुश्मन क्यों हो
जीनेवालों को मरने की
आसानी दे मौला

Friday, November 15, 2013

तेरा प्यार भी कुाबूल नहीं

सुबह रात्रि मित्रों , हालाँकि ये आपके लिए सुबह हो गई है क्या करूँ आदत से मज़बूर हूँ। बॉयय्य्य्य 
 जाते-जाते। … 

हक़ से दे तो तेरी नफरत भी सर-आँखों पे,
खैरात में तो तेरा प्यार भी कुाबूल नहीं। 

Thursday, November 14, 2013

जब खड़े होगे अकेले...

 सुप्रभात दोस्तों आपके सामने खुद पंक्तियाँ प्रस्तुत है,
 जिसे मैंने एक दोस्त के कहने पे लिखा था।
अपनी राय जरूर दें …

 जब खड़े होगे अकेले
 साथ मुझे पाओगे !
 यादों के झरोखे में,
 रोते ही जाओगे.…
 हर कोई होगा साथ,
 खुद को अकेला पाओगे।
 आँसू आखों से छलकेंगे,
 और तुम डूबते जाओगे।
 जब  किसी को याद
 कर-कर के बुलाओगे,
 चेहरा तो खुश होगा,
 आखों को रुलाओगे !
 तकलीफें छोटी हो जायेगी।
 वजह तेरे जब भी किसी 
 भूखे को रोटी हो जायेगी !
 रखना यकीं  इरादों पे,
 इतना अपने, और देखना
 आप बड़े हो जाओगे
 सपने छोटी हो जायेगी !
 मेरे ख्यालों में जो]
 खुद को उलझाओगे,
 उलझते ही चले जाओगे …
 तुम मुझे भूल भी जाओ शायद ?
 मेरे शब्दों को भूल न पाओगे …
                        …निशब्द अभय 

Tuesday, November 12, 2013

परिंदो को आकाश दे दो…

 मैंने आज कुछ लिखने का मन  हुआ और मैंने कलम उठाया और लिख डाली,
 आलोचनायें आमंत्रित हैं … 

नहीं रोयेंगी कोई आँखे,
मुझे विश्वास दे दो !
सारी ज़मीं तुम रखलो,
मुझे आकाश दे दो …

बहुत हो चुकी  तकरारें !
बहुत बन चुकी दीवारें !
तोड़ कर सारी सरहदें,
परिंदो को आकाश दे दो…

ग़म सबके कम हो जाएँ ,
अधरों को मुस्कान मिले !
ले आओ सबकी तकलीफें,
सब-के-सब मेरे पास दे दो…   

हीरे-मोती कब माँगा मै ?
एक एहसान कर मौला !
ज़मीर जिनके मर चुके,
उन लाशों में जान दे दो .…
             …  निशब्द अभय 





Sunday, November 10, 2013

आखिर क्यों ?

आखिर क्यों ? ये बच्चे ईटों के भट्ठों में अपनी कोमल हाथों में कलम के बजाय ईंटों को संतुलित करना सीखते हैं ?
 आखिर क्यों ये मजदूरी करने को मजबूर हैं ?
आखिर क्यों इनकी आँखे इंजीनियर और डॉक्टर बनने के खवाब नहीं देख पाती ?
 ये सोंचने का समय हमारे सरकार के पास नहीं है, और हमारे देश के कुछ बुद्धिजीवी लोग अपनी लाल और पिली  बत्ती युक्त  वातानुकूलित गाडिओं से गरीब बस्तिओं में जाकर चार कॉंपी  और कलम बाँट कर देश को शिक्षित देखना चाहते हैं…
अगर ये सच है कि बच्चे देश का भविष्य होते  हैं? तो आप ये देख सकते है कि हमारे देश कला भविष्य कैसा होने वाला है ???
 इसके लिए अगर कोई उचित कदम नहीं उठाये गए तो हम एक उन्नत देश के श्रेणी मै कभी खड़े नहीं हो पाएंगे ??? !!!

शिक्षित देश का निर्माण तब तक सम्भव नहीं हो सकता जब तक इनके पेट को भर नहीं दिए  जाते , जब तक इनके आत्मा को तृप्त नहीं कर दिए जाते …
  

                                             …निशब्द अभय

Wednesday, November 6, 2013

बलात्कार


"तीन बच्चे, उम्र पैतीस साल,
कौन करेगा ऎसी बूढ़ी से बलात्कार?"
यह कह कर चले गये,
पुलिस के उच्चाधिकारी.

बलात्कार पीडिता के साथ,
फिर हुआ बलात्कार,
इस बार पुलिस द्वारा.

कोई शर्मिंदा नहीं हुआ,
न मुख्य मंत्री,
न गृह मंत्री,
शर्मिंदा हुई भारत माता.

मुझे बचपन में सिखाया था,
जहाँ नारी का सम्मान होता है,
वहाँ देवता निवास करते हैं,
इन्हें बचपन में क्या सिखाया होगा,
इनके माता-पिता ने?

आपकी नजऱ एक गजल …



कट गई झगड़े में सारी रात वस्ल-ए-यार की
शाम को बोसा लिया था, सुबह तक तक़रार की

ज़िन्दगी मुमकिन नहीं अब आशिक़-ए-बीमार की
छिद गई हैं बरछियाँ दिल में निगाह-ए-यार की

हम जो कहते थे न जाना बज़्म में अग़यार[1] की
देख लो नीची निगाहें हो गईं सरकार की

ज़हर देता है तो दे, ज़ालिम मगर तसकीन[2] को
इसमें कुछ तो चाशनी हो शरब-ए-दीदार की

बाद मरने के मिली जन्नत ख़ुदा का शुक्र है
मुझको दफ़नाया रफ़ीक़ों[3] ने गली में यार की

लूटते हैं देखने वाले निगाहों से मज़े
आपका जोबन मिठाई बन गया बाज़ार की

थूक दो ग़ुस्सा, फिर ऐसा वक़्त आए या न आए
आओ मिल बैठो के दो-दो बात कर लें प्यार की

हाल-ए-'अकबर' देख कर बोले बुरी है दोस्ती
ऐसे रुसवाई, ऐसे रिन्द, ऐसे ख़ुदाई ख़्वार की
by:- अकबर इलाहाबादी 
शब्दार्थ:
  1. ग़ैर
  2. तसल्ली
  3. दोस्तों

Monday, November 4, 2013

Gopal Das Neeraj



अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।
दीप, स्वयं बन गया शलभ अब जलते-जलते,
मंजिल ही बन गया मुसाफिर चलते-चलते,
गाते गाते गेय हो गया गायक ही खुद
सत्य स्वप्न ही हुआ स्वयं को छलते छलते,
डूबे जहां कहीं भी तरी वहीं अब तट है,
अब चाहे हर लहर बने मंझधार मुझे परवाह नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।

अब पंछी को नहीं बसेरे की है आशा,
और बागबां को न बहारों की अभिलाषा,
अब हर दूरी पास, दूर है हर समीपता,
एक मुझे लगती अब सुख दुःख की परिभाषा,
अब न ओठ पर हंसी, न आंखों में हैं आंसू,
अब तुम फेंको मुझ पर रोज अंगार, मुझे परवाह नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।

अब मेरी आवाज मुझे टेरा करती है,
अब मेरी दुनियां मेरे पीछे फिरती है,
देखा करती है, मेरी तस्वीर मुझे अब,
मेरी ही चिर प्यास अमृत मुझ पर झरती है,
अब मैं खुद को पूज, पूज तुमको लेता हूं,
बन्द रखो अब तुम मंदिर के द्वार, मुझे परवाह नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।

अब हर एक नजर पहचानी सी लगती है,
अब हर एक डगर कुछ जानी सी लगती है,
बात किया करता है, अब सूनापन मुझसे,
टूट रही हर सांस कहानी सी लगती है,
अब मेरी परछाई तक मुझसे न अलग है,
अब तुम चाहे करो घृणा या प्यार, मुझे परवाह नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।

मै चोर हूँ।



उस बाग के बेंच पर हम तीन थे - एक तरफ एक बुजुर्ग अखबार पढ़ रहे थे, दूसरी तरफ मैं और हम दोनों के बीच में एक अधेड़। तीनों अजनबी। अचानक बुजुर्ग अखबार पटक कर खड़े हो गए, 'सब साले चोर हैं।' अधेड़ ने एतराज किया,'आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए।' बुजुर्ग ने पूछा, 'क्या तुम नेता हो?' अधेड़ बोला, 'नहीं, मैं चोर हूँ।' बुजुर्ग ने 'चोर' से हाथ मिलायाः 'आएम सॉरी, दरअसल मैंने नेताओं के बारे में कहा।'

चीनियों की चीनी कम-कूटनीति

कहते हैं जितनी अक्ल बादाम खाने से नहीं आती, उससे ज्यादा धोखा खाने से आती है। हमने अपने सगे-संबंधियों से ज्यादा अपने पड़ोसियों का भरोसा किया है और पड़ोसियों ने भरोसे की भैंस को पानी में डुबोने में कोई कसर बाकी नहीं रख अपना पड़ोसी धर्म निभा दिया है। चाहे वह चीन हो या पाकिस्तान- हम हर बार धोखा खाते हैं।

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ...

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ... एक जादूगर जादू करता था, तितली को कबूतर, कबूतर को बाज़ और बाज़ को मोर बना देता था। ...