मैँ ढुँढता हुँ जिसको सारे जहान मेँ ..
वो तो यहीँ है दिल के दलान मेँ ..
कौन कहता है मैँ अकेला हुँ यहाँ पर..
तन्हाईयाँ बसती है इस मकान मेँ
सब जगह मुर्दे ही मुर्दे दिखते हैँ ..
फर्क क्या रहा शहर और श्मशान मेँ
उडूँगा और फडफडा के गिर पडूँगा ..
है मेरी जान इस परिँदे की जान मेँ
सूखे गुलाबोँ मेँ मिलेगी प्यार की खुशबू ..
मेरे खत भी मिलेगेँ तुम्हारे सामान मेँ ..
"जश्न"
वो तो यहीँ है दिल के दलान मेँ ..
कौन कहता है मैँ अकेला हुँ यहाँ पर..
तन्हाईयाँ बसती है इस मकान मेँ
सब जगह मुर्दे ही मुर्दे दिखते हैँ ..
फर्क क्या रहा शहर और श्मशान मेँ
उडूँगा और फडफडा के गिर पडूँगा ..
है मेरी जान इस परिँदे की जान मेँ
सूखे गुलाबोँ मेँ मिलेगी प्यार की खुशबू ..
मेरे खत भी मिलेगेँ तुम्हारे सामान मेँ ..
"जश्न"
No comments:
Post a Comment