Sunday, November 10, 2013

आखिर क्यों ?

आखिर क्यों ? ये बच्चे ईटों के भट्ठों में अपनी कोमल हाथों में कलम के बजाय ईंटों को संतुलित करना सीखते हैं ?
 आखिर क्यों ये मजदूरी करने को मजबूर हैं ?
आखिर क्यों इनकी आँखे इंजीनियर और डॉक्टर बनने के खवाब नहीं देख पाती ?
 ये सोंचने का समय हमारे सरकार के पास नहीं है, और हमारे देश के कुछ बुद्धिजीवी लोग अपनी लाल और पिली  बत्ती युक्त  वातानुकूलित गाडिओं से गरीब बस्तिओं में जाकर चार कॉंपी  और कलम बाँट कर देश को शिक्षित देखना चाहते हैं…
अगर ये सच है कि बच्चे देश का भविष्य होते  हैं? तो आप ये देख सकते है कि हमारे देश कला भविष्य कैसा होने वाला है ???
 इसके लिए अगर कोई उचित कदम नहीं उठाये गए तो हम एक उन्नत देश के श्रेणी मै कभी खड़े नहीं हो पाएंगे ??? !!!

शिक्षित देश का निर्माण तब तक सम्भव नहीं हो सकता जब तक इनके पेट को भर नहीं दिए  जाते , जब तक इनके आत्मा को तृप्त नहीं कर दिए जाते …
  

                                             …निशब्द अभय

Wednesday, November 6, 2013

बलात्कार


"तीन बच्चे, उम्र पैतीस साल,
कौन करेगा ऎसी बूढ़ी से बलात्कार?"
यह कह कर चले गये,
पुलिस के उच्चाधिकारी.

बलात्कार पीडिता के साथ,
फिर हुआ बलात्कार,
इस बार पुलिस द्वारा.

कोई शर्मिंदा नहीं हुआ,
न मुख्य मंत्री,
न गृह मंत्री,
शर्मिंदा हुई भारत माता.

मुझे बचपन में सिखाया था,
जहाँ नारी का सम्मान होता है,
वहाँ देवता निवास करते हैं,
इन्हें बचपन में क्या सिखाया होगा,
इनके माता-पिता ने?

आपकी नजऱ एक गजल …



कट गई झगड़े में सारी रात वस्ल-ए-यार की
शाम को बोसा लिया था, सुबह तक तक़रार की

ज़िन्दगी मुमकिन नहीं अब आशिक़-ए-बीमार की
छिद गई हैं बरछियाँ दिल में निगाह-ए-यार की

हम जो कहते थे न जाना बज़्म में अग़यार[1] की
देख लो नीची निगाहें हो गईं सरकार की

ज़हर देता है तो दे, ज़ालिम मगर तसकीन[2] को
इसमें कुछ तो चाशनी हो शरब-ए-दीदार की

बाद मरने के मिली जन्नत ख़ुदा का शुक्र है
मुझको दफ़नाया रफ़ीक़ों[3] ने गली में यार की

लूटते हैं देखने वाले निगाहों से मज़े
आपका जोबन मिठाई बन गया बाज़ार की

थूक दो ग़ुस्सा, फिर ऐसा वक़्त आए या न आए
आओ मिल बैठो के दो-दो बात कर लें प्यार की

हाल-ए-'अकबर' देख कर बोले बुरी है दोस्ती
ऐसे रुसवाई, ऐसे रिन्द, ऐसे ख़ुदाई ख़्वार की
by:- अकबर इलाहाबादी 
शब्दार्थ:
  1. ग़ैर
  2. तसल्ली
  3. दोस्तों

Monday, November 4, 2013

Gopal Das Neeraj



अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।
दीप, स्वयं बन गया शलभ अब जलते-जलते,
मंजिल ही बन गया मुसाफिर चलते-चलते,
गाते गाते गेय हो गया गायक ही खुद
सत्य स्वप्न ही हुआ स्वयं को छलते छलते,
डूबे जहां कहीं भी तरी वहीं अब तट है,
अब चाहे हर लहर बने मंझधार मुझे परवाह नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।

अब पंछी को नहीं बसेरे की है आशा,
और बागबां को न बहारों की अभिलाषा,
अब हर दूरी पास, दूर है हर समीपता,
एक मुझे लगती अब सुख दुःख की परिभाषा,
अब न ओठ पर हंसी, न आंखों में हैं आंसू,
अब तुम फेंको मुझ पर रोज अंगार, मुझे परवाह नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।

अब मेरी आवाज मुझे टेरा करती है,
अब मेरी दुनियां मेरे पीछे फिरती है,
देखा करती है, मेरी तस्वीर मुझे अब,
मेरी ही चिर प्यास अमृत मुझ पर झरती है,
अब मैं खुद को पूज, पूज तुमको लेता हूं,
बन्द रखो अब तुम मंदिर के द्वार, मुझे परवाह नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।

अब हर एक नजर पहचानी सी लगती है,
अब हर एक डगर कुछ जानी सी लगती है,
बात किया करता है, अब सूनापन मुझसे,
टूट रही हर सांस कहानी सी लगती है,
अब मेरी परछाई तक मुझसे न अलग है,
अब तुम चाहे करो घृणा या प्यार, मुझे परवाह नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।

मै चोर हूँ।



उस बाग के बेंच पर हम तीन थे - एक तरफ एक बुजुर्ग अखबार पढ़ रहे थे, दूसरी तरफ मैं और हम दोनों के बीच में एक अधेड़। तीनों अजनबी। अचानक बुजुर्ग अखबार पटक कर खड़े हो गए, 'सब साले चोर हैं।' अधेड़ ने एतराज किया,'आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए।' बुजुर्ग ने पूछा, 'क्या तुम नेता हो?' अधेड़ बोला, 'नहीं, मैं चोर हूँ।' बुजुर्ग ने 'चोर' से हाथ मिलायाः 'आएम सॉरी, दरअसल मैंने नेताओं के बारे में कहा।'

चीनियों की चीनी कम-कूटनीति

कहते हैं जितनी अक्ल बादाम खाने से नहीं आती, उससे ज्यादा धोखा खाने से आती है। हमने अपने सगे-संबंधियों से ज्यादा अपने पड़ोसियों का भरोसा किया है और पड़ोसियों ने भरोसे की भैंस को पानी में डुबोने में कोई कसर बाकी नहीं रख अपना पड़ोसी धर्म निभा दिया है। चाहे वह चीन हो या पाकिस्तान- हम हर बार धोखा खाते हैं।

दिल जला के मनाई दिवाली।

लेखनी के साथ खेलने का इनका एक अलग ही अंदाज़  है I
हथियार कलम है इनका और ये एक उम्दा जंगबाज़ है …

पेश है बड़े भैया तुल्य कविवर कि कुछ पंक्तियाँ।.

दोस्तों प्यार से सुनो ग़ज़ल

जुल्म ढाती रही रात काली,
दिल जला के मनाई दिवाली।
चांद से शिकवा करे है चकोरा,
रैन आती नही मिलन वाली।
कसर हम भी नही छोड़ते पर,
क्या करे आजकल जेब खाली।
याद उसकी रहे पास हरदम,
बेवफा ने कसम तोड़ डाली।
ये समझ से परे क्या करे हम,
किसलिये क्यों खफा बाग़ माली 
                             ...राजेन्द्र रैना 

अँधेरों को आफताब देखता हूँ।

 मैं   अपने एक कवि  मित्र  की  रचना आपको  भेँट कर रहा हुँ  ।  जो काव्यकुल के  एक छोटे बेटे कि तरह है परन्तु उनके 
लेखनी का तेज़ इतना  है कि काव्य जगत में व्याप्त वर्तमान  अँधेरा  दूर कर देगा  !!!
 
में जागती आँखों से कुछ ख्वाब देखता हूँ।
काँटों की अँजुमन से गुलाब देखता हूँ।

धारदार नस्तरों को जेब मे रखते हुए।
घनघोर अँधेरों को आफताब देखता हूँ।

जो कभी पर्दानशीं थे आज बेपर्दा हुए।
उम्र का ढलता हुआ सबाब देखता हूँ।

उस रोज जाते जाते जो खत लिखा था उसने।
मैं आज तक उस खत का जबाब देखता हूँ।

मैं जागती आँखों से कुछ ख्वाब देखता हूँ......

                                     ...एलेश
भाई सहब 

Sunday, November 3, 2013

दिवाली कि शुभकामनाऐ दोस्तों ,,,






यह दिया बुझे नहीं
                        - गोपाल सिंह नेपाली

यह दिया बुझे नहीं
घोर अंधकार हो
चल रही बयार हो
आज द्वार–द्वार पर यह दिया बुझे नहीं
यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है।
शक्ति का दिया हुआ
शक्ति को दिया हुआ
भक्ति से दिया हुआ
यह स्वतंत्रता–दिया
रूक रही न नाव हो
जोर का बहाव हो
आज गंग–धार पर यह दिया बुझे नहीं
यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है।
यह अतीत कल्पना
यह विनीत प्रार्थना
यह पुनीत भावना
यह अनंत साधना
शांति हो, अशांति हो
युद्ध, संधि, क्रांति हो
तीर पर¸ कछार पर¸ यह दिया बुझे नहीं
देश पर, समाज पर, ज्योति का वितान है।
तीन–चार फूल है
आस–पास धूल है
बांस है –बबूल है
घास के दुकूल है
वायु भी हिलोर दे
फूंक दे, चकोर दे
कब्र पर मजार पर, यह दिया बुझे नहीं
यह किसी शहीद का पुण्य–प्राण दान है।
झूम–झूम बदलियाँ
चूम–चूम बिजलियाँ
आंधिया उठा रहीं
हलचलें मचा रहीं
लड़ रहा स्वदेश हो
यातना विशेष हो
क्षुद्र जीत–हार पर, यह दिया बुझे नहीं
यह स्वतंत्र भावना का स्वतंत्र गान है।
  रचनाकार :-- गोपाल सिंह नेपाली

- सर मिर्जा गालिब


हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले
डरे क्यों मेरा कातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खून जो चश्म-ऐ-तर से उम्र भर यूं दम-ब-दम निकले
निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले
भ्रम खुल जाये जालीम तेरे कामत कि दराजी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-खम का पेच-ओ-खम निकले
मगर लिखवाये कोई उसको खत तो हमसे लिखवाये
हुई सुबह और घर से कान पर रखकर कलम निकले
हुई इस दौर में मनसूब मुझसे बादा-आशामी
फिर आया वो जमाना जो जहाँ से जाम-ए-जम निकले
हुई जिनसे तव्वको खस्तगी की दाद पाने की
वो हमसे भी ज्यादा खस्ता-ए-तेग-ए-सितम निकले
मुहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले
जरा कर जोर सिने पर कि तीर-ऐ-पुरसितम निकले
जो वो निकले तो दिल निकले, जो दिल निकले तो दम निकले
खुदा के बासते पर्दा ना काबे से उठा जालिम
कहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफिर सनम निकले
कहाँ मयखाने का दरवाजा 'गालिब' और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं, कल वो जाता था के हम निकले
--
चश्म-ऐ-तर - wet eyes
खुल्द - Paradise
कूचे - street
कामत - stature
दराजी - length
तुर्रा - ornamental tassel worn in the turban
पेच-ओ-खम - curls in the hair
मनसूब - association
बादा-आशामी - having to do with drinks
तव्वको - expectation
खस्तगी - injury
खस्ता - broken/sick/injured
तेग - sword
सितम - cruelity
क़ाबे - House Of Allah In Mecca
वाइज़ - preacher

नर हो न निराश करो मन को - मैथिलीशरण गुप्त

नर हो न निराश करो मन को
                     - मैथिलीशरण गुप्त

नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रहके निज नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न निराश करो मन को ।
संभलो कि सुयोग न जाए चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो न निराश करो मन को ।
जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को ।
निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
मरणोत्तर गुंजित गान रहे
कुछ हो न तजो निज साधन को
नर हो न निराश करो मन को ।

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ...

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ... एक जादूगर जादू करता था, तितली को कबूतर, कबूतर को बाज़ और बाज़ को मोर बना देता था। ...