Sunday, November 3, 2013

आग की भीख


धुँधली हुई दिशाएँ, छाने लगा कुहासा
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँसा
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है
मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज सो रहा है
दाता पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे
प्यारे स्वदेश के हित अँगार माँगता हूँ
चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ

बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है
मँझदार है, भँवर है या पास है किनारा?
यह नाश आ रहा है या सौभाग्य का सितारा?
आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा
भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा
तमवेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ
ध्रुव की कठिन घड़ी में, पहचान माँगता हूँ

आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है
बलपुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है
अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ डेर हो रहा है
है रो रही जवानी, अँधेर हो रहा है
निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है
पंचास्यनाद भीषण, विकराल माँगता हूँ
जड़ताविनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ

मन की बंधी उमंगें असहाय जल रही है
अरमान आरजू की लाशें निकल रही हैं
भीगी खुशी पलों में रातें गुज़ारते हैं
सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं
इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ
विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ

आँसू भरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे
मेरे शमशान में आ श्रंगी जरा बजा दे
फिर एक तीर सीनों के आरपार कर दे
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे
आमर्ष को जगाने वाली शिखा नयी दे
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ
बेचैन जिन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ

ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे
जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे
हम दे चुके लहु हैं, तू देवता विभा दे
अपने अनलविशिख से आकाश जगमगा दे
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ
तेरी दया विपद् में भगवान माँगता हूँ

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

अँधेरे का दीपक

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था ,
भावना के हाथ से जिसमें वितानों को तना था,
स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा,
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था,
ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर कंकड़ों को
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

बादलों के अश्रु से धोया गया नभनील नीलम
का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम,
प्रथम उशा की किरण की लालिमासी लाल मदिरा
थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम,
वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनो हथेली,
एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

क्या घड़ी थी एक भी चिंता नहीं थी पास आई,
कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई,
आँख से मस्ती झपकती, बातसे मस्ती टपकती,
थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई,
वह गई तो ले गई उल्लास के आधार माना,
पर अथिरता पर समय की मुसकुराना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिसमें राग जागा,
वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा,
एक अंतर से ध्वनित हो दूसरे में जो निरन्तर,
भर दिया अंबरअवनि को मत्तता के गीत गागा,
अन्त उनका हो गया तो मन बहलने के लिये ही,
ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

हाय वे साथी कि चुम्बक लौहसे जो पास आए,
पास क्या आए, हृदय के बीच ही गोया समाए,
दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिलाकर
एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गाए,
वे गए तो सोचकर यह लौटने वाले नहीं वे,
खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

क्या हवाएँ थीं कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना,
कुछ न आया काम तेरा शोर करना, गुल मचाना,
नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका,
किन्तु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना,
जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से,
पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

Saturday, November 2, 2013

बेच रहे हैं आज धर्म को, धर्म के ठेकेदार

DEEPAK SUKLA SIR !

बेच रहे हैं आज धर्म को, धर्म के ठेकेदार
जाने कितनों के हिस्से हैं, हैं कितने हिस्सेदार

कोई योग को बेच रहा है, कोई योगी को
बापू बापू कहते हैं, सब देखो भोगी को
किसी के चेले नेता हैं, तो किसी के है स्टार
बेच रहे हैं आज धर्म को, धर्म के ठेकेदार

जीवन जीना सिखलाते हैं, पर मुफ़्त नहीं है सीख
बड़े-बड़े आश्रम में देखो, मांगी जाती भीख
दावा है अच्छा करने का, पर खुद हैं ये बीमार
बेच रहे हैं आज धर्म को, धर्म के ठेकेदार

कोई निवारण करे दुखों का, कोई करे समागम
लेके देवी रूप है पाती, नोट कोई झमाझम
कहें सादगी में ईश्वर है, करें खूब श्रृंगार
बेच रहे हैं आज धर्म को, धर्म के ठेकेदार

धर्म सत्य है, धर्म शील है, धर्म है संयम में
इनमें सत्य, ना शील बचा है, ना रहते संयम में
फिर भी भारी भीड़ जुटा लेते हैं ये हर बार
बेच रहे हैं आज धर्म को, धर्म के ठेकेदार
Mere Sabhi Mitro ko DEEPAWALI ki hardik Shubhkamnaye...
"jalao diye par rhe dhyan itna......
andhera dh_ara par kahi rah na jaye......"

Tuesday, September 24, 2013

Ro-ro ke naa apne jaan gaye hote ...

Koi nahi apna iss Amiron ki Basti main,
kaash Maa ki Baat maan gaye hote !
Kaash pehle hi tujhe jaan gaye hote,
to sayad,
Ro-ro ke naa apne jaan gaye hote ...

wo bekhabar se rehte hai...

Chupakar chhand sa chehra wo bekhabar se rehte hai ,
hum hai banzare jo hamesa Safar main rehte hai ,
ye dil to pagal hai jo tumpe hi hai thehra ,
Hogi koi mazboori jo Wo patthar sa dil kiye, 
sishe ke Mahal me rehte hai...

                                                 ...nishabd abhay

Dr. Kunwar Baichain

dr. kunwar baichain
उँगलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था जिसे
राह में छोड़ गया राह पे लाया था जिसे

उसने पोंछे ही नहीं अश्क मेरी आँखों से
मैंने खुद रोके बहुत देर हँसाया था जिसे

बस उसी दिन से खफा है वो मेरा इक चेहरा
धूप में आइना इक रोज दिखाया था जिसे

छू के होंठों को मेरे वो भी कहीं दूर गई
इक गजल शौक से मैंने कभी गाया था जिसे

दे गया घाव वो ऐसे कि जो भरते ही नहीं
अपने सीने से कभी मैंने लगाया था जिसे

होश आया तो हुआ यह कि मेरा इक दुश्मन
याद फिर आने लगा मैंने भुलाया था जिसे

वो बड़ा क्या हुआ सर पर ही चढ़ा जाता है
मैंने काँधे पे `कुँअर' हँस के बिठाया था जिसे

Monday, August 5, 2013

Baalon se naa khelo hey baala ...

Aaj mere ek kavi mitr ne kesh (hair) pe kuch panktiyan likhne ko kaha or maine bhi aaw dekha na taav likh daali, logon ne to jhoothi taarif kar hi diya but aap wahi kehna jo aapko lage...

yun Baalon se naa khelo hey baala ,
megh sa chhaye ye kesh kaala !
inn dhago ko yun na lapeto unglion pe,
Tadap ke mar jayega koi bhola-bhala !
Krishn bhi Radha ke keshon k deewane,
wo bhi ulajh kar bhool jate Gaiya charana !
agar Bacchan hote facebook pe to,
kesho pe likh dete ek Madhusala !
hamari baato ko dil pe naa lenaqki
TATA SKY LAGA DALA TO LIFE ZINGA LALA !
                                            ...Nishabd abhay                                                  

Saturday, August 3, 2013

झोपड़ी जलाकर रौशनी वो सरेआम करते है।

Andhera hi andhera hai sach ki raho me,
wo Fareb ke ujaale me aaram krte hai...







अँधेरा ही अँधेरा है सच कि राहों में 
वो फरेब के उजालों में आराम करते हैं।  

hame kamjoor samajhti hai ye Dunia,
sar jhukakr jo hum Salaam krte hai....


हमें कमजोर समझती है ये दुनियाँ ,
सर झुकाके जो हम सलाम करते हैं।  
 
ek Diyaa bhi na jala saka mai logo k lie.
Jhopri jalakar rousni wo sareaam karte hai...

एक दीया भी  ना जला सका मैं लोगो के लिए ,
झोपड़ी जलाकर रौशनी वो सरेआम करते है। 
                                      …  निशब्द अभय 

dil pe Chhuri quatil ne nazro se Fira di "

Man me ajeeb se sawal utpann ho rahe hai ?
Jo dikhta hai wo hota q nahi hai ???
Jise apna sabse accha dost samjho wo hi daga de jaata hai ?
Jise hamdard samjha jaye aakhir wahi dard deta hai !
Mai khud me uljha saa mehsus kar raha hun...
Do panktiyan bade himmat se likh paya hun , aap himmat den......

Ankhon ke waar se dil ki deewar gira di ,
dil pe Chhuri  quatil ne nazro se Fira di "
                                                                  ..." Nishabd abhay""

apke hukm ka intejaar kare sab...

aapke hukm ka intejaar kare sab,
haatho me koi aisi Chhadi ho jaye !
Khuda ek Karam kar mere dost pe,
uske khusion ki Chadar badi ho jaye ...
                                     ..." Nishabd abhay "

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ...

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ... एक जादूगर जादू करता था, तितली को कबूतर, कबूतर को बाज़ और बाज़ को मोर बना देता था। ...