Wednesday, August 11, 2021

कविता-पदक यूं ही नहीं मिलता

तुम सूंघ रहे हो बस स्वर्ण की महक
फूल सोने का यू हीं खिलता नहीं।
पदक, पदक, पदक यूं ही मिलता नहीं।।

धकेला है वर्षों, तब मिली है जमीन
पहाड़ सफलता का यूं ही हिलता नहीं
पदक, पदक , पदक यूं ही मिलता नहीं।।

सुखाया है खुद को धूप में छांव में
आग, लकड़ियों में यूं ही जलता नहीं
पदक, पदक , पदक यूं ही मिलता नहीं।।

सिया है कई बार फटे हाल ज़िन्दगी
किस्मत का दरार यूं ही सिलता नहीं
पदक, पदक , पदक यूं ही मिलता नहीं।।

गोते कई खाए होंगें, बीच समंदर में
मोती, सिपो से यूं ही निकलता नहीं।
पदक, पदक, पदक, यूं ही मिलता नहीं।।

झेला है कई बारिश और कई ठंड
फल पेड़ो में मीठा यूं ही फलता नहीं
पदक, पदक, पदक, ऐसे ही मिलता नहीं।।

तपता है सालों मेहनत के भट्टी में
लोहा,सांचे में यूं ही ढलता नहीं
पदक, पदक, पदक, यूं ही मिलता नहीं।।

छीलते है घुटने, टूटती है उंगलियां
कोई, एक बार में यूं ही चलता नहीं
पदक, पदक, पदक, यूं ही मिलता नहीं।।

निरंतर प्रयास एवं कठिन परिश्रम
इतिहास पुराना यूं ही बदलता नहीं
पदक, पदक, पदक, यूं ही मिलता नहीं।।
पदक, पदक, पदक, यूं ही मिलता नहीं।।

- विवेक मुखर्जी

No comments:

Post a Comment

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ...

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ... एक जादूगर जादू करता था, तितली को कबूतर, कबूतर को बाज़ और बाज़ को मोर बना देता था। ...