इसी साल स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा स्पेस में भेजे गए थे, इसी साल भारतीय आर्मी ने ऑपरेशन मेघदूत को अंजाम दिया, जिससे की भारत को सियाचिन ग्लेशियर पर पूर्णतः कंट्रोल मिला | कुछ अच्छी चीज़ें होने के साथ ही 1984 ने कुछ भयावह घटनाओं को भी महसूस किया | जरनैल सिंह का स्वर्ण मंदिर को किलाबंद करना, ऑपरेशन ब्लू स्टार का होना, भारतीय फ़ौज का स्वर्ण मंदिर में घुसना और अंततः इंदिरा गाँधी की हत्या ; ये सारे ही हादसे पूरे भारतवर्ष के लिए ही बड़े दुखद थे | सुबह के 9:30 बजे इंदिरा गाँधी के दो अंगरक्षकों ने उनपे गोलियां बरसा दीं, मगर उन गोलियों से सिर्फ इंदिरा गाँधी का नहीं, बल्कि पूरे भारत का खून बहा | प्रधानमंत्री की हत्या की खबर जैसे ही जनता तक पहुंची, तब तक नफरत की आंधी एक बड़ा बवंडर बन चुकी थी | लोग ढून्ढ ढून्ढ कर मासूम सिखों की हत्या करते रहे | हर तरफ काल अपनी भुजाएं खोल कर भोले मासूम लोगों को अपनी चपेट में लेता रहा | दिन आग की लपट जैसी भयावह और रातें खून जैसी लाल होती गयीं |
ठीक यही नरसंहार, हमारे बोकारो की धरती पर भी हुआ | 1984 से पहले बोकारो शहर में सिखों की एक बड़ी आबादी हुआ करती थी, जो कमोबेश व्यापार पर आश्रित थे | दूर दिल्ली में लगी इस आग की ताप ने, बोकारो तक पहुँचते पहुँचते एक नरसंहार की आगजनी को जन्म दे दिया |
इसी शहर के रहने वाले सत्य व्यास ने जो की एक प्रतिष्ठित लेखक हैं, 84 नाम की एक किताब लिखी | वैसे तो मैं हिंदी के नए लेखकों को बहुत कम पढता था, मगर कुछ दोस्तों के बार बार कहने पर मैंने उनकी लिखी "84" ले ली, और सोचा के कभी वक़्त निकाल कर पढ़ लूंगा | काफी महीने ये किताब मेरे बुकशेल्फ की शोभा बढाती रही | एक दिन अचानक जब मैं अपनी शेल्फ में कोई किताब ढून्ढ रहा था तब मेरी नज़र 84 पर पड़ी | सोचा के कुछ पन्ने पलट कर देख लेता हूँ, किसे पता था के वो कुछ पन्ने पलटने का इरादा मुझे रात भर जगा देगा | कहानी शुरू होने के बाद एक मिनट को भी ये ख्याल नहीं आया के इसे अधूरा पढ़ कर रख दूँ, और इसी वजह से जब तक कहानी अपने अंजाम तक नहीं पहुंची मैं इस किताब को रख ही नहीं पाया | जब पूरी किताब पढ़ ली, तब नींद आँखों से ओझल हो चुकी थी और उसकी जगह एक सोच ने ले ली थी | क्या अगर मैं ये किताब न पढता तो मुझे बोकारो के इस रूप के बारे में कभी पता चलता? क्या कभी मैं दंगों से प्रभावित लोगों के मन की बेचैनी समझ पाता? अपनी कहानियों में दंगे बहुतों ने लिखे हैं मगर सत्य व्यास ने दंगों का सौन्दर्यीयकरण नहीं किया बल्कि उसकी कुरूपता को शीशे के सामने खड़ा कर दिया | हर इंसान के अंदर दो व्यक्तित्व रहते हैं और कब कौन सा व्यक्तित्व उस इंसान पर भारी पड़ जाए, ये मैंने 84 पढ़ने के बाद जाना | कहानी जहां एक तरफ दंगों की मार्मिकता को दर्शाती है, वहीँ प्रेम की झलकियां भी दिखाती है | उस समय अगर एक लड़का किसी लड़की के प्रेम में पड़ जाए तो फिर रोमांस किस तरह का होगा ये बड़ा बखूबी लिखा गया है | अरबी साहित्य में प्रेम के 7 पड़ाव के बारे में कहा जाता है; आकर्षण, आसक्ति, प्रेम, विश्वास, उपासना, आवेग और मृत्यु | ये कहानी आपको इसके भी पार ले कर जाती है |
अगर आप किताबें पढ़ने के शौक़ीन हैं और आपने 84 नहीं पढ़ी तो आपसे कुछ छूट रहा है | मेरी मानिये तो आज ही पढ़ लीजिये , और अगर आप किताबें पढ़ने में रूचि नहीं रखते तो इसी कहानी पर आधारित एक वेब-सीरीज जिसका नाम "ग्रहण" है हॉटस्टार पर आने वाली है | हमारे शहर की कहानी है मतलब ये हमारी कहानी है |
- सैफ इसरार
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