Wednesday, August 11, 2021

कविता-पदक यूं ही नहीं मिलता

तुम सूंघ रहे हो बस स्वर्ण की महक
फूल सोने का यू हीं खिलता नहीं।
पदक, पदक, पदक यूं ही मिलता नहीं।।

धकेला है वर्षों, तब मिली है जमीन
पहाड़ सफलता का यूं ही हिलता नहीं
पदक, पदक , पदक यूं ही मिलता नहीं।।

सुखाया है खुद को धूप में छांव में
आग, लकड़ियों में यूं ही जलता नहीं
पदक, पदक , पदक यूं ही मिलता नहीं।।

सिया है कई बार फटे हाल ज़िन्दगी
किस्मत का दरार यूं ही सिलता नहीं
पदक, पदक , पदक यूं ही मिलता नहीं।।

गोते कई खाए होंगें, बीच समंदर में
मोती, सिपो से यूं ही निकलता नहीं।
पदक, पदक, पदक, यूं ही मिलता नहीं।।

झेला है कई बारिश और कई ठंड
फल पेड़ो में मीठा यूं ही फलता नहीं
पदक, पदक, पदक, ऐसे ही मिलता नहीं।।

तपता है सालों मेहनत के भट्टी में
लोहा,सांचे में यूं ही ढलता नहीं
पदक, पदक, पदक, यूं ही मिलता नहीं।।

छीलते है घुटने, टूटती है उंगलियां
कोई, एक बार में यूं ही चलता नहीं
पदक, पदक, पदक, यूं ही मिलता नहीं।।

निरंतर प्रयास एवं कठिन परिश्रम
इतिहास पुराना यूं ही बदलता नहीं
पदक, पदक, पदक, यूं ही मिलता नहीं।।
पदक, पदक, पदक, यूं ही मिलता नहीं।।

- विवेक मुखर्जी

Thursday, June 24, 2021

सत्य व्यास के उपन्यास 84, पर आधरित है नई Web Series Grahan

1984, ये भारत के लिए कभी न भूले जाने वाले वक़्त के जैसा है |
 इसी साल स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा स्पेस में भेजे गए थे, इसी साल भारतीय आर्मी ने ऑपरेशन मेघदूत को अंजाम दिया, जिससे की भारत को सियाचिन ग्लेशियर पर पूर्णतः कंट्रोल मिला | कुछ अच्छी चीज़ें होने के साथ ही 1984 ने कुछ भयावह घटनाओं को भी महसूस किया | जरनैल सिंह का स्वर्ण मंदिर को किलाबंद करना, ऑपरेशन ब्लू स्टार का होना, भारतीय फ़ौज का स्वर्ण मंदिर में घुसना और अंततः इंदिरा गाँधी की हत्या ; ये सारे ही हादसे पूरे भारतवर्ष के लिए ही बड़े दुखद थे | सुबह के 9:30 बजे इंदिरा गाँधी के दो अंगरक्षकों ने उनपे गोलियां बरसा दीं, मगर उन गोलियों से सिर्फ इंदिरा गाँधी का नहीं, बल्कि पूरे भारत का खून बहा | प्रधानमंत्री की हत्या की खबर जैसे ही जनता तक पहुंची, तब तक नफरत की आंधी एक बड़ा बवंडर बन चुकी थी | लोग ढून्ढ ढून्ढ कर मासूम सिखों की हत्या करते रहे | हर तरफ काल अपनी भुजाएं खोल कर भोले मासूम लोगों को अपनी चपेट में लेता रहा | दिन आग की लपट जैसी भयावह और रातें खून जैसी लाल होती गयीं | 

ठीक यही नरसंहार, हमारे बोकारो की धरती पर भी हुआ | 1984 से पहले बोकारो शहर में सिखों की एक बड़ी आबादी हुआ करती थी, जो कमोबेश व्यापार पर आश्रित थे | दूर दिल्ली में लगी इस आग की ताप ने, बोकारो तक पहुँचते पहुँचते एक नरसंहार की आगजनी को जन्म दे दिया |

इसी शहर के रहने वाले सत्य व्यास ने जो की एक प्रतिष्ठित लेखक हैं, 84 नाम की एक किताब लिखी | वैसे तो मैं हिंदी के नए लेखकों को बहुत कम पढता था, मगर कुछ दोस्तों के बार बार कहने पर मैंने उनकी लिखी "84" ले ली, और सोचा के कभी वक़्त निकाल कर पढ़ लूंगा | काफी महीने ये किताब मेरे बुकशेल्फ की शोभा बढाती रही | एक दिन अचानक जब मैं अपनी शेल्फ में कोई किताब ढून्ढ रहा था तब मेरी नज़र 84 पर पड़ी | सोचा के कुछ पन्ने पलट कर देख लेता हूँ, किसे पता था के वो कुछ पन्ने पलटने का इरादा मुझे रात भर जगा देगा | कहानी शुरू होने के बाद एक मिनट को भी ये ख्याल नहीं आया के इसे अधूरा पढ़ कर रख दूँ, और इसी वजह से जब तक कहानी अपने अंजाम तक नहीं पहुंची मैं इस किताब को रख ही नहीं पाया | जब पूरी किताब पढ़ ली, तब नींद आँखों से ओझल हो चुकी थी और उसकी जगह एक सोच ने ले ली थी | क्या अगर मैं ये किताब न पढता तो मुझे बोकारो के इस रूप के बारे में कभी पता चलता? क्या कभी मैं दंगों से प्रभावित लोगों के मन की बेचैनी समझ पाता? अपनी कहानियों में दंगे बहुतों ने लिखे हैं मगर सत्य व्यास ने दंगों का सौन्दर्यीयकरण नहीं किया बल्कि उसकी कुरूपता को शीशे के सामने खड़ा कर दिया | हर इंसान के अंदर दो व्यक्तित्व रहते हैं और कब कौन सा व्यक्तित्व उस इंसान पर भारी पड़ जाए, ये मैंने 84 पढ़ने के बाद जाना | कहानी जहां एक तरफ दंगों की मार्मिकता को दर्शाती है, वहीँ प्रेम की झलकियां भी दिखाती है | उस समय अगर एक लड़का किसी लड़की के प्रेम में पड़ जाए तो फिर रोमांस किस तरह का होगा ये बड़ा बखूबी लिखा गया है | अरबी साहित्य में प्रेम के 7 पड़ाव के बारे में कहा जाता है; आकर्षण, आसक्ति, प्रेम, विश्वास, उपासना, आवेग और मृत्यु | ये कहानी आपको इसके भी पार ले कर जाती है |

अगर आप किताबें पढ़ने के शौक़ीन हैं और आपने 84 नहीं पढ़ी तो आपसे कुछ छूट रहा है | मेरी मानिये तो आज ही पढ़ लीजिये , और अगर आप किताबें पढ़ने में रूचि नहीं रखते तो इसी कहानी पर आधारित एक वेब-सीरीज जिसका नाम "ग्रहण" है हॉटस्टार पर आने वाली है | हमारे शहर की कहानी है  मतलब ये हमारी कहानी है |

- सैफ इसरार

Friday, March 5, 2021

‘औघड़’ Book Review

 ‘औघड़’ भारतीय ग्रामीण जीवन और परिवेश की जटिलता पर लिखा गया उपन्यास है

जिसमें अपने समय के भारतीय ग्रामीण-कस्बाई समाज और राजनीति की गहरी पड़ताल की गई है। एक युवा लेखक द्वारा इसमें उन पहलुओं पर बहुत बेबाकी से कलम चलाया गया है जिन पर पिछले दशक के लेखन में युवाओं की ओर से कम ही लिखा गया। ‘औघड़’ नई सदी के गाँव को नई पीढ़ी के नजरिये से देखने का गहरा प्रयास है। महानगरों में निवासते हुए ग्रामीण जीवन की ऊपरी सतह को उभारने और भदेस का छौंका मारकर लिखने की चालू शैली से अलग, ‘औघड़’ गाँव पर गाँव में रहकर, गाँव का होकर लिखा गया उपन्यास है। ग्रामीण जीवन की कई परतों की तह उघाड़ता यह उपन्यास पाठकों के समक्ष कई विमर्श भी प्रस्तुत करता है। इस उपन्यास में भारतीय ग्राम्य व्यवस्था के सामाजिक-राजनितिक ढाँचे की विसंगतियों को बेहद ह तरीके से उजागर किया गया है। ‘औघड़’ धार्मिक पाखंड, जात-पात, छुआछूत, महिला की दशा, राजनीति, अपराध और प्रसाशन के त्रियक गठजोड़, सामाजिक व्यवस्था की सड़न, संस्कृति की टूटन, ग्रामीण मध्य वर्ग की चेतना के उलझन इत्यादि विषयों से गुरेज करने के बजाय, इनपर बहुत ठहरकर विचारता और प्रचार करता चलता है। व्यंग्य और गंभीर संवेदना के संतुलन को साधने की अपनी चिर-परिचित शैली में नीलोत्पल मृणाल ने इस उपन्यास को लिखते हुए हिंदी साहित्य की चलती आ रही सामाजिक सरोकार वाली लेखन को थोड़ा और आगे बढ़ाया है।.

Book Address:
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Monday, March 1, 2021

वो लड़ा मगर सिर्फ अपने लिए लड़ा। Book Review Twelfth Fail

ट्वेल्थ फेल | Twelfth Fail | 12th Fail (Hindi)

Writer : Anurag Pathak
Book Price: 196
Pages: 175
publisher: 
Type:  Novel (Hindi)
Ratings : 4.6 Flipkart, 4.5 (Amazon)
Buy: https://amzn.to/2OemaRN

"प्रतिभाएं अकारण आगे नहीं बढ़ती। वे बढ़ती है आपने पुरुषार्थ से, अपने समर्पण से, अपनी मेहनत से, अपने त्याग से, अपनी प्रबल इच्छाशक्ति से।"

आज मैंने दूसरी बार इस किताब को पढ़ा है पहली बार भी जब मैंने पढ़ा था तब भी रोया था और आज भी, शायद मैं खुद को इस उपन्यास में ढुढ पा रहा हूं, या फिर उस पीड़ा को महसूस कर पा रहा हू! लेकिन मैं इसको जितना बार भी पढ़ता हू एक नया ऊर्जा का प्रवाह अपने अंदर महसूस करता हू। मैं सिर्फ इतना ही कह कर अपनी वाणी को समाप्त करूंगा की समस्या बाहर का अंधकार का नहीं है, समस्या तब होती है जब हमरा मन सुविधाओं के लालच में समझौता के अन्धकार में डूब जाता है।
मैं सभी हिन्दी प्रेमियों से कहना चाहता हूं कि सबको ये किताब एक बार जरूर पढ़नी चाहिए!


वर्षों बाद इस डिजिटल दुनिया से इतर कुछ अच्छा पढ़ा
एक प्रतियोगी छात्र किन मनोदशाओं से गुजरता है. कितने मान अपमान सहकर वह निरन्तर अपने लक्ष्य की तरफ उन्मुख रहता है.
जीवन में क्या क्या उसे प्रेरित करता है, कितने कठिन संघर्ष व जुझारू प्रवृत्ति के दम पर अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है, इसका सजीव चित्रण है यह कहानी !
प्रतियोगियों के संघर्ष का व रिजल्ट के बाद की दशा जिसमें कुछ चयनित प्रसन्न व बाकी कैसे उदास होते हैं.
इसका मार्मिक वर्णन कहानी के अन्तिम क्षणों में वरुण नाम के चरित्र के अपने दिल्ली के कमरे को छोड़ते हुए दिखाते समय लेखक ने किया है.
मनोज व श्रद्धा का एक दूसरे के प्रति निश्छल स्नेह व लक्ष्य के प्रति एक निष्ठ समर्पण मन रूपी वीणा को अन्दर तक झंकृत कर देता है, को परिष्कृत करता है....
बहुत कुछ प्रेरणादायक है इस उपन्यास में प्रतियोगी छात्रों व सुधी पाठकों के लिए.
ट्वेल्थ फ़ैल खुद से खुद का साक्षात्कार सा प्रतीत होता है! प्रत्येक सामान्य युवा अपने अंदर मनोज को प्रवाहित सा महसूस कर सकता है! ग्रामीण परिवेश के पात्रों का स्थानीय बोली में उदबोधन लेखक को मिट्टी पकड़ पहलवान साबित करता है ! श्रद्धा आज की नारी का प्रतिनिधित्व करती है जो ना केवल बौद्धिक क्षमता से परिपूर्ण है अपितु त्याग और स्नेह की प्रतिमूर्ति है ! पांडे और गुप्ता ने अपने खिलंदड़पान से हम सबको गुदगुदाने का अवसर दिया !
आज के दौर में समसामयिक सात्विक रचना के लिए लेखक अप्रतिम बधाई के पात्र है !!
अगली रचना के इन्तजार मे.
किसी व्यक्ति को अगर वास्तव में संघर्ष की परिभाषा जानना हो तो वो अनुराग पाठक की लिखी हुई यह किताब पढ़े. Priyanshu Vatsaly

Book is available on Amazon

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Twelfth Fail - 12th fail by anurag pathak



अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ...

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ... एक जादूगर जादू करता था, तितली को कबूतर, कबूतर को बाज़ और बाज़ को मोर बना देता था। ...