सारी चालाकी धरी रह जायेगी तुम्हारी, तुम्हारा समझदार होने का गुमान तुम्हारे बर्बादी का कारण बनेगा। अब तुमसे प्रेम करने वाला सँभलने का वक़्त भी देने के मूड में नहीं है.
तुम्हें क्या लगता था कोई तुमसे स्नेह और प्रेम के प्रतिफल तुम्हारी यातनाएं सहकर तुम पर अमृतवर्षा करता रहेगा? अपना सर्वश्व लुटाकर तुम्हारे रास्ते में फूल सजायेगा ? अगर तुम ऐसा सोंचते हो तो तुम गलत सोंचते हो ... बिलकुल गलत !!
अब प्रकृति तुम्हारे जुल्म के बदले शीतलता नहीं क्रोध बरपायेगा गुस्से का ज्वाला इत्ना तेज होगा की तुम कल्पना भी नही कर सकते।
इन्सान अपने दिमाग के प्रयोग से विज्ञान द्वारा कितना भी तरक्की क्यों ना कर ले किन्तु सत्य को झूठला नहीं सकता "पृथ्वी किसी का ऋण नहीं रखती, वह मूल को सूद समेत वापस करती है"
सारी यातनाएं जो पृथ्वी पर बोए गए, अब उसके फसल काटने का समय आ गया है।
जब किसी का अस्तित्व संकट में आ जाए तब उसे अपने रक्षा के लिए रौद्र रूप धारण करना आवश्यक हो जाता है।
तुम्हें ख़याल भी है की तुम अपने चालाक और समझदार होने के मद में उतावले होकर प्राकृतिक की ओर दौड़ पड़े रास्ते में पड़ने वाले पेड़-पौधों जीव जंतुओं नदी नालों को रौंदकर तहस-नहस कर डाला, जिधर तुम्हें हरा भरा जंगल दिखा उधर कुल्हाड़ी लेकर लग गए सीमेंट और कंक्रीट के जंगल उगाने, आकाश नीला था वहाँ तुमने कारखानों का जहर घोल दिया, बड़े-बड़े विराट पर्वतों को भी तोड़कर न जाने कितने सड़कें और ऊंचे मकान बनाया तुमने। तुम्हें खबर भी है कि तुम किधर भी गए सिर्फ प्रकृति का दोहन ही किया।
लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है प्रकृति अब नरमी बरतने के मूड में नहीं है, जिसका अंदाज सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है बेखौफ झुंड के झुंड बेतहाशा भागने वाले चालाक इन्सान घरों में बंद है। देश दुनियाँ में ताला लग चूका है. पहिये का अविष्कार हुआ तब से लेकर आज तक इंसान कभी रुका ही नहीं, मोटर, बस, बुलेट ट्रैन, जेट बनाकर दुनियाँ को मुट्ठी में समेट लेने वाले लोगों की समझ एक वायरस के सामने धरी की धरी रह गई।
तुम्हें क्या लगता था कोई तुमसे स्नेह और प्रेम के प्रतिफल तुम्हारी यातनाएं सहकर तुम पर अमृतवर्षा करता रहेगा? अपना सर्वश्व लुटाकर तुम्हारे रास्ते में फूल सजायेगा ? अगर तुम ऐसा सोंचते हो तो तुम गलत सोंचते हो ... बिलकुल गलत !!
अब प्रकृति तुम्हारे जुल्म के बदले शीतलता नहीं क्रोध बरपायेगा गुस्से का ज्वाला इत्ना तेज होगा की तुम कल्पना भी नही कर सकते।
इन्सान अपने दिमाग के प्रयोग से विज्ञान द्वारा कितना भी तरक्की क्यों ना कर ले किन्तु सत्य को झूठला नहीं सकता "पृथ्वी किसी का ऋण नहीं रखती, वह मूल को सूद समेत वापस करती है"
सारी यातनाएं जो पृथ्वी पर बोए गए, अब उसके फसल काटने का समय आ गया है।
जब किसी का अस्तित्व संकट में आ जाए तब उसे अपने रक्षा के लिए रौद्र रूप धारण करना आवश्यक हो जाता है।
तुम्हें ख़याल भी है की तुम अपने चालाक और समझदार होने के मद में उतावले होकर प्राकृतिक की ओर दौड़ पड़े रास्ते में पड़ने वाले पेड़-पौधों जीव जंतुओं नदी नालों को रौंदकर तहस-नहस कर डाला, जिधर तुम्हें हरा भरा जंगल दिखा उधर कुल्हाड़ी लेकर लग गए सीमेंट और कंक्रीट के जंगल उगाने, आकाश नीला था वहाँ तुमने कारखानों का जहर घोल दिया, बड़े-बड़े विराट पर्वतों को भी तोड़कर न जाने कितने सड़कें और ऊंचे मकान बनाया तुमने। तुम्हें खबर भी है कि तुम किधर भी गए सिर्फ प्रकृति का दोहन ही किया।
लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है प्रकृति अब नरमी बरतने के मूड में नहीं है, जिसका अंदाज सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है बेखौफ झुंड के झुंड बेतहाशा भागने वाले चालाक इन्सान घरों में बंद है। देश दुनियाँ में ताला लग चूका है. पहिये का अविष्कार हुआ तब से लेकर आज तक इंसान कभी रुका ही नहीं, मोटर, बस, बुलेट ट्रैन, जेट बनाकर दुनियाँ को मुट्ठी में समेट लेने वाले लोगों की समझ एक वायरस के सामने धरी की धरी रह गई।
यह प्रकृति का महज एक संकेत नहीं चुनौती है की अगर आने वाले समय में इंसान अपनी आदतों से बाज नहीं आए और प्राकृतिक के कार्यों में हस्तक्षेप किया तो अगले बार स्थिति और भयावह हो सकती है और उसका जिम्मेदार वे स्वयं होंगे।
-कुमार अभय

बहुत ही सुन्दर रचना है।
ReplyDeleteबहुत ही अद्भुत एवं बहुत ही सुंदर रचना आपके द्वारा लेखक महोदय आपकी कल्पना कोई भी नहीं कर सकता आपकी कलमों के द्वारा समाज को एक अच्छा संदेश मिला है एवं उम्मीद करते हैं आपके संदेश के द्वारा समाज में एक क्रांति लेकर आएगी और लोग प्राकृतिक के बारे में सोचने पर विवश होंगे और मैं उम्मीद करता हूं आप के माध्यम से हम सभी को इसी प्रकार बहुत ही सुंदर संदेश प्राप्त होता रहे बहुत-बहुत धन्यवाद आपका दिल से आभार आपका
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