शहर-शहर, नगर-नगर
डगर-डगर, इधर-उधर?
पथिक तुझे तलाश क्या?
क्या चाहिये ओ बेखबर??
किसे तू है ढूँढता
क्या तुझमें नहीं खुदा ?
घर, लौट आ वक़्त पर
भटक रहा क्यों दरबदर?
मन में बस विश्वाश रख
खुद को अपने साथ रख
तू नाप लेगा ये धरा
कदमों में तेरे धरा शिखर
है मौन कुछ तो बोलता
चुप्पियों को सुन जरा
ये शोर है, वो झूठ है
भीड़ पर मत रख नज़र
चल पड़े हो तो सुनो
ख्वाब एक नया बुनो
रास्ते पर हक़ तुम्हारा
क्या सोंचते हो बैठ कर?
सुनता नहीं कोई यहाँ
हर कोई जवाब है
पत्थर तुझको ही पड़ेंगे
उंचे तेरे ख्वाब हैं।
समन्दर में तूम जा मिलोगे
बस एक नदी को पार कर
जीत जायेगा जहाँ तू 'अभय'
अपना सबकुछ हार कर।।
ओ बेखबर..तू क्यों दर बदर??
Copyright कुमार अभय
डगर-डगर, इधर-उधर?
पथिक तुझे तलाश क्या?
क्या चाहिये ओ बेखबर??
किसे तू है ढूँढता
क्या तुझमें नहीं खुदा ?
घर, लौट आ वक़्त पर
भटक रहा क्यों दरबदर?
मन में बस विश्वाश रख
खुद को अपने साथ रख
तू नाप लेगा ये धरा
कदमों में तेरे धरा शिखर
है मौन कुछ तो बोलता
चुप्पियों को सुन जरा
ये शोर है, वो झूठ है
भीड़ पर मत रख नज़र
चल पड़े हो तो सुनो
ख्वाब एक नया बुनो
रास्ते पर हक़ तुम्हारा
क्या सोंचते हो बैठ कर?
सुनता नहीं कोई यहाँ
हर कोई जवाब है
पत्थर तुझको ही पड़ेंगे
उंचे तेरे ख्वाब हैं।
समन्दर में तूम जा मिलोगे
बस एक नदी को पार कर
जीत जायेगा जहाँ तू 'अभय'
अपना सबकुछ हार कर।।
ओ बेखबर..तू क्यों दर बदर??
Copyright कुमार अभय

धन्यवाद.
ReplyDeleteबहुत ही अनिदा भाई और आगे मिले कामयाबी तुमको इसी तरह ।
ReplyDeleteबहुत-बहुत धन्यवाद प्यारे भाई
Deleteएक-एक शब्द तर्क और अनुभव के आधार पर लिखी गयी है । सीखने और इन पंक्तियों पर अमल करने की जरूरत है ।
Deleteप्रेरणा देती एक कविता
ReplyDeleteआभार अभय