एक पुरानी कहावत है की देने वाले हाथ आराधना करने वाले हाथ से बड़े होते हैं, और एक पुरानी कहावत यह भी है की दान दाहिने हाथ से दी जाए तो बाएं को पता ना चले.पर यह दौर आधुनिक है हमारा पुरानी कहावत से कोई वास्ता नहीं और हम पूरानी बातों को नहीं मानते, हमारे नए दौर का अपना नया कहावत है "नेकी कर सोशल मीडिया में डाल..." और हम उसी को मानेंगे
तस्वीर गौर से देखे तो पता चलता है की देने वाले एहसान करते हुए प्रमाण के तौर पर तस्वीर ले चुकें है जबकि कम्बल प्राप्त करता व्यक्ति इस बार ठण्ड से तो बच जाएगा किन्तु इस एहसान के बोझ से शायद ही बच पाए ।
लोग दिखावे के रेस में इतनी तेज दौड़ रहे हैं की उन्हें खबर ही नहीं की संस्कार तेजी से पीछे छूट रहा है और वैचारिक दरिद्रता की और बढ़ रहे हैं.
मेरा समझना है की सोशल मिडिया का प्रयोग वैसे तस्वीरों और पोस्ट के लिए किये जाएँ जिससे लोग दान सहयोग करने के उद्देश्य से करें न की उपकार . दान वैसा होना चाहिए जिससे देने वाला आनंदित,और प्राप्त करने वाला सम्मानित महसूस करे ।
__आवारा कलम
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