अखबारी लाल.
उस आदमी को लेखक समझा जाता है जिसकी रचना अखबार में छपती हो, जिनकी नहीं छपती वो भला लेखक कैसे हो सकता है. मैं आपको बताता चलूँ की मेरी रचना अखबार मैं प्रकाशित हुई है लेकिन इसका क़तई मतलब नहीं की मैं कोई कलमकार जैसा कोई चीज हूँ। ये तो दीपक भैया का तारीफ़ है जो मेरे जैसे आलसी लड़के से लेख लिखवा लिया और समाचार पत्र में छापा भी।
दीपक भैया कहते हैं आपकी लेखनी थोड़ी हट कर होती है, ये तो मुझे नहीं पता की हट कर होती है या नहीं होती, इसका पड़ताल आपको करनी है. तो आपके हवाले वो अख़बार के कतरन कर रहा हूँ पढ़िए और बताइयेगा की मुझे आगे लिखना चाहिए या नहीं ?
मेरा दोस्त विकास कहता है की मेरा दुश्मन मैं खुद हूँ क्योंकि मैं अपने जुबान के वजह से अक्सर फँसता रहता हूँ, विकाश के बातों को आप सीरियस न लीजियेगा क्योंकि ये सलाहकार टाइप का बंदा है, वो जिससे भी मिलता है कोई न कोई सलाह दे आता है, विकास के बारे में फिर कभी बात करूँगा फिलहाल इतना जान लीजिये लातेहार में एक यही दोस्त है जिसके साथ हाथा-पाई, गाली-गलौज के साथ प्यार प्रदर्शित करने की आज़ादी है मुझे!! मतलब भाई है वो अपना। वो भाई है इसी लिए इसको किनारे कर के पहले लेख की और आता हूँ.


उस आदमी को लेखक समझा जाता है जिसकी रचना अखबार में छपती हो, जिनकी नहीं छपती वो भला लेखक कैसे हो सकता है. मैं आपको बताता चलूँ की मेरी रचना अखबार मैं प्रकाशित हुई है लेकिन इसका क़तई मतलब नहीं की मैं कोई कलमकार जैसा कोई चीज हूँ। ये तो दीपक भैया का तारीफ़ है जो मेरे जैसे आलसी लड़के से लेख लिखवा लिया और समाचार पत्र में छापा भी।
दीपक भैया कहते हैं आपकी लेखनी थोड़ी हट कर होती है, ये तो मुझे नहीं पता की हट कर होती है या नहीं होती, इसका पड़ताल आपको करनी है. तो आपके हवाले वो अख़बार के कतरन कर रहा हूँ पढ़िए और बताइयेगा की मुझे आगे लिखना चाहिए या नहीं ?
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| My First article in Mithila Varnan, |
जैसा की बता चूका हूँ की अपनी जुबान ही मुझे जोखिम में डाल देती है लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. हुआ यों रविवार को मैं रांची गया था दीपक भैया शाम 4 बजे फ़ोन किया हर बार की तरह लेख लिखने को कहा विषय दिया पर्यावरण दिवस और मैंने हाँ कर दिया। इस विषय पर कोई खास समझ नहीं बन रहा था की लिखा क्या जाए? तो दोस्त आकाश को बताया की मुझे इस विषय पर लिखना है तो उसने एक लेखिका के बारे में बताया जो जंगल बचाने के आंदोलन में जेल जा चुकी है. उनसे बात हुई उन्होंने जंगल की कई सारी बातें बताई। जंगल कटाई से लेकर सरकार के जंगल लगाने के बारे में कई बातें कहीं उन्होंने कहा हम जिस तरह से जंगल काट रहे हैं उसके तुलना में पेड़ नहीं लगाते। मैंने कहा की सरकार कहती है की वो जंगल लगा रहे हैं. इसपर उनका जवाब था की कुछ गिने हुवे पेड़ लगा देने से जंगल नहीं लगते हैं जिन सैकड़ो साल पुराने पेड़ों को काट कुछ पौधे लगाए गए हैं उन्हें कम से कम मैं तो जंगल नहीं कह सकती उनके बातों में गुस्सा था। उनसे मिलने के बाद ये लेख पूरा किया। भैया ने कहा था की शाम 5 बजे तक भेजने से रचना छपेगा लेकिन मैंने रात को 10 बजे दीपक भैया को भेजा ताकि भैया को ये न लगे की मैं कोशिश नहीं किया। मुझे उम्मीद नहीं था की मेरी रचना छपेगी लेकिन दीपक भैया को ये ही मंजूर था और दूसरे दिन छाप कर मुझे फोटो भेज दिया :) और इस प्रकार मैं पहली बार अपने लेख के साथ अखबार में छपा। मेरे इस लेख पर मुझसे ज्यादा खुश सीतेश हुआ था और फेसबुक पर मुझ से पहले पोस्ट कर दिया।
इसके बाद कॉन्फिडेंस का पंख ही लग गया थोड़ा और आगे लिखा जो निचे चिपकाया है।
पढ़िए,आलोचना कीजिये, अच्छी लगे तो मेरा हौसला बढ़ा दीजिये, खामी है तो सलाह दीजिये, जरूरी लगे तो कान खींचिये और आपका मन करे तो टांग भी.... प्रतिक्रिया के इंतजार में रहूँगा !!




thank a ton sir !
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