दोस्ती श्री कृष्ण सुदामा अशफाक बिस्मिल से होते हुए उसके और मेरे तक पहुंची और जिंदगी मुकम्मल हो गया। सरकारी स्कूल में उसके लाये बोरे पर मुझे भी बिठाना, टिफिन बेरा उसके पैसे से चूरन चटनी खरीद कर आपस में बराबर बांटना और कभी बेमन पढ़ाई से बोर होकर गुरुजी से नजरें चुरा खिड़की के रास्ते भाग कर बेर तोड़ने जाते थे और पकड़े जाने पर साथ ही मास्टर साहब द्वारा कुटे जाते थे। रिश्ता इतना गाढ़ा था कि एक नंबर और दो नंबर करने साथ जाया करते। अपनी टूटी साइकिल भी वह मेरे अलावा किसी को चलाने नहीं देता था। उसी ने कैची वाली साइकिल चलाना सिखाया था. और हां उसी ने अव्वल दर्जे का गाली देना भी सिखाया था। जितने प्यार से हम दोस्ती निभाते उतनी ही शिद्दत से हम लड़ते भी थे, हमारा झगड़ा भी युद्ध के माफिक महीनों चलता था। झगड़े का दिन world war का रिकॉर्ड ना तोड़ दे इसीलिए हम ये कहकर बोलचाल शुरू करते थे कि "ऐ दू गो कलम लाया है???" और इस तरह कलम आदान प्रदान करके हमारी दोस्ती की गाड़ी फिर पटरी पर आ जाती थी। हमारा रिश्ता थोड़ा खट्टा थोड़ा मीठा, थोड़ा नमकीन और थोड़ा तीखा कुल मिलाकर चटपटी थी अपनी यारी।
बचपन की दोस्ती वाले वो दिन तो अब नहीं रहे पर यादों के संदूक में रखें दोस्ती की तस्वीर आज भी कलेजे को उतनी ही ठंडक देती है जितना वो देता था। कई सालों से उससे नहीं मिला. जिंदगी की उलझनों में उलझ कर हम दूर तो हो गए हैं लेकिन मुझे लगता है कि एक दिन हम फिर मिलेंगे ठीक वैसे ही जैसे दो लंगोटिया यार मिलते हैं उसके सिखाए गाली के साथ स्वागत करके।



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