Saturday, December 7, 2019

Rock Garden Ranchi Jharkhand


🙂 वेलकम टू रॉक गार्डन 
                                              रॉक गार्डन 
रांची में वैसे घूमने के बहुत से जगह हैं.. उसमे से एक जगह रॉक गार्डन है जैसा की नाम से उजागर हो रहा है यह बगीचा पत्थरों के ऊपर तराशा गया  हैं तो मुझे लगता है आप रॉक गार्डन का अर्थ सही सही समझ गए होंगे ??  अगर कोई लोग नहीं समझे तो मोटे शब्दों में पत्थरों के ऊपर घूमने का स्थान समझ लीजियेगा ।

तो चलिए चट्टान वाले पार्क का सैर कर लेते हैं,
नोट:- आपको अगर पढ़ने में अटपटा लगे तो ये सोंच कर झेल लीजियेगा की मैं ज्यादा पढ़ा लिखा लेखक टाइप का आदमी नहीं हूँ।

सैर से पहले रास्ता जान लीजिये। 

स्टेशन से बहार निकल कर आप सीधे रातू रोड का ऑटो ले लीजिये 20 या 25 रुपया भाड़ा में पंहुचा देगा उसके बाद एक दूसरा ऑटो लेकर कांके रोड में जाना होगा, वही ऑटो वाला 10 रुपया लेकर रॉक गार्डन (गांधीनगर) के गेट के पास उतार देगा। मतलब ज्यादा माथापच्ची की जरूरत नहीं है ढूंढने में कोई परेशानी नहीं होगा। 

दाहिना पैर आगे कर के गेट में प्रवेश करिये। 
मुख्य द्वार 

 लेकिन टिकट उस से पहले कटवाना होगा, मूल्य है 30 रूपये/ व्यक्ति। कैमरा और अलग तरह के  रिकॉर्डिंग उपकरण ले जाने के लिए अतरिक्त मूल्य पार्क वालों ने निर्धारित किये हैं. ये मोबाइल के लिए लागू नहीं होता तो आप मेरे तरह मुफ्त में मोबाइल ले कर जा सकते हैं.

मैप यहाँ भी है https://bit.ly/2Lvv9db
अपने नाम के अनुसार ये रांची के चट्टानी पहाड़ी स्थान में कारीगरी कर बनाया गया है. इसके चारो तरफ जहाँ जहाँ जगह खाली है वहां सलीके से पेड़ लगाए गए है जो इसके खूबसूरती में एक कुछ अंक और जोड़ देता है। यहाँ से कांके डैम का खूबसूरत नजारा मन मारक होता है (इसका फोटो आगे सलीके से लगा दिया है देख लीजियेगा). इसका सीधा सम्बन्ध आपके फोटो खिचवाने से है, अगर आप फोटोग्राफी या सेल्फी के शौकीन हैं तो एक बार यहाँ हो आइये।
  इस स्थान में लोग पिकनिक मानाने के उद्देश्य से आते हैं।

पार्क में  जितना कारीगरी किया जाना  चाहिए था उतना उन्होंने किया है, आपको कोई ऐसा जगह नहीं दिखेगा जहां बनाने वालों ने दिमाग नहीं लगाया हो. जैसे जहाँ पेड़ लगा है उसके निचे  बैठने के लिए कुर्सी लगा दिया है, कहीं झूले तो कहीं मूर्ति।
प्रेमी जोड़ों के लिए मधुवन है यह पार्क 
प्यार किया तो डरना क्या सीधे रॉक गार्डन जाइये। मेरा मतलब है यह स्थान प्रेमी जोड़ों के लिए वरदान जैसा है. जब मैं यहाँ पहली दफा गया  तो अचरज में पड़ गया की सुहाने मौसम में सब छतरी ओढ़ के जोड़े में बैठे कर क्या रहे है?  कुछ गमछा या दुपट्टा ओढ़े बैठे थे. ,मैंने सोचा पुरुष महिला के आँखों में गया कचरा निकाल रहा होगा .  पता नहीं चल पा रहा था की वे गमछे के पीछे पुरुष महिला मित्र के आँखों से कौन सा कचरा निकाल रहा है.  परेशान तो तब हो गया जब हर तरफ जोड़े में लोग एक जैसे हरकत कर रहे थे.
 कुछ देर देखने के बाद समझ आया की ये लोग प्रेम कर रहे हैं. खामखा परेशान हो गया मैं.  यहां देख कर दिमाग ने देश का एक बड़ा समस्या का समाधान कर दिया की अगर युवाओं के लिए प्रेम करने के लिए इस पार्क का व्यवस्था कर दिया जाए जहां युवा लगे रहें
आपके लिए सिखने जैसी बात इसमें ये है की वहां महिला मित्र के साथ जाने से पहले गमछा या छाता जरूर ले लें.
अगर आप जोड़े में नहीं जा रहे हैं तो आप आपके लिए अकेले बैठने का जगह ढूंढना मुश्किल  हो सकता है. मैं नफरत के इस दौर में एक साथ इतने प्रेम करते लोगों को देख कर धन्य हो गया. लोग कहते हैं प्रेम दीखता नहीं तो उनको यहाँ का एड्रेस बता दीजिये, पूरा कांसेप्ट क्लियर न हो जाए तो कहना।  यहाँ आने के बाद मैं दावे के साथ कहूंगा की यहाँ से होकर गया आदमी सीधा मोक्ष को प्राप्त होगा।

इस तरह के आनंद के लिए इस प्रकार के साधन यहाँ उपलब्ध है. बचपन में स्कूल में भीड़ के कारन अगर ये वाला झूला का मजा नहीं ले पाए हों तो यहाँ ये अधूरा शौंक पूरा हो जायेगा. क्योंकि ये अक्सर खाली ही रहता है.

बाकी तस्वीरों की जुबानी आगे सस्वती बता देगी।
ये सीढी की ख़ूबसूरती सीधे दिल तक जाती है

ये दाहिने तरफ के तस्वीर में झूला पूल पार्क के सौंदर्य में जान ड़ाल देता है, इसमें चढ़ कर कलकत्ते के हावड़ा पूल का तो फील नहीं आएगा पर फोटो लाजवाब आएगा।
जैसा हमने पहले बताया था यहाँ से कांके डैम का आकर्षक नजारा दीखता है तो देख लीजिये हम झूठ नहीं लिखते।
ये पोस्ट मनोरंजन के उद्देश्य से लिखा गया है आशा है आप उसी अंदाज में लेंगे, और एक बात आपसे की हमेशा मजे में रहिये। 

Thursday, October 24, 2019

शहर मांगे मंगल चाचा

 
बोकारो मांगे मंगल चाचा... बोकारो मांगे बंटू लाल...
यह वाला गगनभेदी नारों से सोशल मीडिया वालों ने आसमान छेद दिया है। फेसबुक व्हाट्सएप टि्वटर जिधर नजर दौड़ा लीजिए उधर ही मंगल चाचा और बंटू लाल के समर्थक आपस में भिड़े हुए हैं। दोनों का कहना है बोकारो समझदार लोगों की नगरी है और वह समझदारी से सिर्फ उन्हीं को चुनेंगे और जो नहीं चुनेंगे वह निहायती नासमझ और समाज विरोधी ही होंगे। उनका समाज के विकास से कोई सरोकार नहीं है और ऐसे असामाजिक लोगों को घसीट कर समाज से ही नहीं बल्कि देश से भी बाहर फेंक देना चाहिए।
अखिर मै समझ नही पाता हूँ की यह मांग जायज है या नाजायज? यह सोचकर दिमाग का डाल्टनगंज होने के बाद सन्न हो गया है की यह शहर मांग किससे रहा है? क्योंकि बोकारो तो स्वयं महान है और अगर बोकारो मांग रहा है तो देने वाला सोचिए कितना महान होगा?? मेरे हिसाब से तथ्य विचारणीय है आपको एक~आध बार सोचना चाहिए। किसी ने कहा है कि दो बड़े लोगों की बात हो रही हो तो छोटों को नहीं बोलना चाहिए। इसीलिए तो आप कुछ बोलिए मत क्योंकि कहाँ आप ठहरे आम आदमी और कहां बंटू लाल करोड़पति और कहां मंगल चाचा जैसे नामी ग्रामी लोग। आप जरा बुद्धि लगा कर सोचिए की जिसे महान बोकारो मांग रहा है उन्हें आप कुछ देने की हैसियत रखते हैं क्या? आम आदमी हैं ज्यादा फड़फड़ाइए मत उन्हें देने के चक्कर में उनके इर्द-गिर्द भी फटके और गलती से उनके अंग रक्षकों के हत्थे चढ़ गए तो आपका आम आदमी होने के गुमान के साथ सारी हेकड़ी ठंडा हो जाएगा, आम आदमी का भूत सर से हवा हो जाएगा।
एक वह दिन हुआ करता था जब आदमी थका मांदा ऑफिस से आ कर फेसबुक टि्वटर जैसे तीर्थस्थलों में होकर दो पल का सुकून पाता था, कार्यालय का दुख विसारता था लेकिन भैया इन पवित्र स्थानों पर जब से मंगल चाचा और बंटू लाल के समर्थक आने लगे हैं वातावरण बिगाड़ दिया है, चारों तरफ अशांति का माहौल व्याप्त है। अब कोई ढंग का नेता मिले तो उनसे कहूं इस विपदा से छुटकारा दिलाने के लिए कोई अनशन ही कर दे इससे उनका भी भला हो जाएगा चुनाव वाले दिन है।
मेरा अपना मानना है की आज कल दिन बहुत बुरे आ गए हैं हमारे समय में प्रत्याशी चुनाव के समय खुले हाथों से दिया करते थे लेकिन आज हाथ नहीं फैलाते बल्कि उनकी योग्यता, ईमानदारी और कर्मठता देख शहर ही उनको मांग लेता है।

मैं तलाश कर रहा हूं बोकारो को अगर मिल जाएगा तो उस से ही पूछ लूंगा कि बोकारो क्या माँग रहे हो तुम? बोकारो तुम चाहते क्या हो?

Thursday, April 18, 2019

अखबारी लाल

अखबारी लाल.
उस आदमी को लेखक समझा जाता है जिसकी रचना अखबार में छपती हो, जिनकी नहीं छपती वो भला लेखक कैसे हो सकता है. मैं आपको बताता चलूँ की मेरी रचना अखबार मैं प्रकाशित हुई है लेकिन इसका क़तई मतलब नहीं की मैं कोई कलमकार जैसा कोई चीज हूँ। ये तो दीपक भैया का तारीफ़ है जो मेरे जैसे आलसी लड़के से लेख लिखवा लिया और समाचार पत्र में छापा भी।
                                                                     दीपक भैया कहते हैं आपकी लेखनी थोड़ी हट कर होती है,  ये तो मुझे नहीं पता की हट कर होती है या नहीं होती, इसका पड़ताल आपको करनी है. तो आपके हवाले वो अख़बार के कतरन कर रहा हूँ पढ़िए और बताइयेगा की मुझे आगे लिखना चाहिए या नहीं ?                                                                                                                                                                                                                         
My First article in Mithila Varnan,

मेरा दोस्त विकास कहता है की मेरा दुश्मन मैं खुद हूँ क्योंकि मैं अपने जुबान के वजह से अक्सर फँसता रहता हूँ, विकाश के बातों को आप सीरियस न लीजियेगा क्योंकि ये सलाहकार टाइप का बंदा है, वो जिससे भी मिलता है कोई न कोई सलाह दे आता है, विकास के बारे में फिर कभी बात करूँगा फिलहाल इतना जान लीजिये लातेहार में एक यही दोस्त है जिसके साथ हाथा-पाई, गाली-गलौज के साथ प्यार प्रदर्शित करने की आज़ादी है मुझे!! मतलब भाई है वो अपना। वो भाई है इसी लिए इसको किनारे कर के पहले लेख की और आता हूँ.
                               जैसा की बता चूका हूँ की अपनी जुबान ही मुझे जोखिम में डाल देती है लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. हुआ यों रविवार को मैं रांची गया था दीपक भैया शाम 4 बजे फ़ोन किया हर बार की तरह लेख लिखने को कहा विषय दिया पर्यावरण दिवस और मैंने हाँ कर दिया।  इस विषय पर कोई खास समझ नहीं बन रहा था की लिखा क्या जाए?  तो दोस्त आकाश को बताया की मुझे इस विषय पर लिखना है तो उसने एक लेखिका के बारे में बताया जो जंगल बचाने के आंदोलन में जेल जा चुकी है. उनसे बात हुई उन्होंने जंगल की कई सारी बातें बताई। जंगल कटाई से लेकर सरकार के जंगल लगाने के बारे में कई बातें कहीं  उन्होंने कहा हम जिस तरह से जंगल काट रहे हैं उसके तुलना में पेड़ नहीं लगाते। मैंने कहा की सरकार कहती है की वो जंगल लगा रहे हैं. इसपर उनका जवाब था की कुछ गिने हुवे पेड़ लगा देने से जंगल नहीं लगते हैं जिन सैकड़ो साल पुराने पेड़ों को काट कुछ पौधे लगाए गए हैं उन्हें कम से कम मैं तो जंगल नहीं कह सकती उनके बातों में गुस्सा था। उनसे मिलने के बाद ये लेख पूरा किया। भैया ने कहा था की शाम 5 बजे तक भेजने से रचना छपेगा लेकिन मैंने रात को 10 बजे दीपक भैया को भेजा ताकि भैया को ये न लगे की मैं कोशिश नहीं किया। मुझे उम्मीद नहीं था की मेरी रचना छपेगी लेकिन दीपक भैया को ये ही मंजूर था और दूसरे दिन छाप कर मुझे फोटो भेज दिया  :)  और इस प्रकार मैं पहली बार अपने लेख के साथ अखबार में छपा। मेरे इस लेख पर मुझसे ज्यादा खुश सीतेश हुआ था और फेसबुक पर मुझ से पहले पोस्ट कर दिया। 
इसके बाद कॉन्फिडेंस का पंख ही लग गया थोड़ा और आगे लिखा जो निचे चिपकाया है।

पढ़िए,आलोचना कीजिये, अच्छी लगे तो मेरा हौसला बढ़ा दीजिये, खामी है तो सलाह दीजिये, जरूरी लगे तो कान खींचिये और आपका मन करे तो टांग भी.... प्रतिक्रिया के इंतजार में रहूँगा !! 


Tuesday, April 9, 2019

चुनाव आने वाले हैं.

तस्वीर: गूगल की सहायता से। 
जब बेहिसाब बजने लगें नगाड़े, बीना शादी बंटने लगें छुहारे।
जब विलुप्त हो रहे माननीय,  आपके घर रोज पधारें
अचानक आपके ऊपर पुष्पक विमान से पुष्पवर्षा होने लगे
कोई झोंक अपना तन, मन, धन करे आपका अभिनन्दन,
तो अत्यधिक प्रसन्नं न हों भगवन, ये चुनाव आने के हैं लक्षण ।
इस चुनाव के आने के पर मैंने अपनी दूर दृष्टि जमाई,
दिमाग के मटके में मथनी घुमाई, तो ये निकला मलाई


कुछ दंगे होने वाले हैं 
कुछ लफड़े होने वाले हैं 
कुछ दो कौड़ी के नेता अब 
तगड़े  वाले हैं। ..... चुनाव आने वाले हैं। 

कुछ को मुकुट दिखाएंगे 
कुछ तो टोपी पहनाएंगे 
खूब झमाझम बारिश होगी 
नंगे सभी नहाएंगे। ..... चुनाव आने वाले हैं। 

कभी रोटी पर बात चलेगी 
कभी बोटी पर चर्चा होगा 
सारे मुद्दे उठ जायेंगे 
भिखमंगों पर भी खर्चा होगा ..... चुनाव आने वाले हैं। 

दर्द की अब छुट्टी होगी 
वादों की अब घुट्टी होगी 
इधर उधर जो बिखर गए थे 
बंद वो सारी मुट्ठी होगी ..... चुनाव आने वाले हैं। 

शर्म का पिंजरा टूटेगा 
एक सभ्य खजाना लूटेगा 
किसी का किस्मत चमकेगा 
किसी का भंडा फूटेगा..... चुनाव आने वाले हैं। 

कुछ जाने माने चेहरे 
गुमनाम भी होने वाले हैं 
कुछ शोहरत वाले लोग यहाँ 
बदनाम भी होने वाले हैं ..... चुनाव आने वाले हैं।

___ कुमार अभय  

वैधानिक चेतावनी: पढ़ने के बाद अच्छी या बुरी टिपण्णी न की तो आपको पाप लगेगा।






अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ...

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ... एक जादूगर जादू करता था, तितली को कबूतर, कबूतर को बाज़ और बाज़ को मोर बना देता था। ...