आज फिर लिखने का मन हुआ, आपके अवलोकनार्थ सप्रेम समर्पित
बंदे तु कब तक छिपाएगा,
जो अंदर है, बाहर तो आएगा !
जब अपनो की बात चलेगी,
तेरा मुखौटा उतर जाएगा !
हर तरफ़ मातमी मंजर है,
बचकर तू किधर जाएगा !
वक्त रहते लोहे सा बन जा,
ठोकर लगेगी, बिखर जाएगा !
ज़मीर अब भी जिंदा करले,
वर्ना आईना देख मर जाएगा !
कंकर-पत्थर से रिश्ते न तौल,
तू ये सोंच क्या ऊपर जाएगा ?
किसी के जीवन निखार 'अभय'
हो सकता है, तू भी संवर जाएगा...
निःशब्द अभय
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