चलो इक बार ये जोखिम उठाया जाये
सभी को आज आईना दिखाया जाये
शहर मेँ पागलोँ को बाँट देँ सब पत्थर
घरोँ के सामनेँ शीशा लगाया जाऐ
हमेशा पीठ पे खाये हैँ नश्तर तुमनेँ
कि खँजर को जिगर भी तो दिखाया जाये
रगो मेँ दौडता है उसे खूँ कह दूँ ?
जो है पानी उसे पानी बताया जाये ..
कुमार "जश्न"
सभी को आज आईना दिखाया जाये
शहर मेँ पागलोँ को बाँट देँ सब पत्थर
घरोँ के सामनेँ शीशा लगाया जाऐ
हमेशा पीठ पे खाये हैँ नश्तर तुमनेँ
कि खँजर को जिगर भी तो दिखाया जाये
रगो मेँ दौडता है उसे खूँ कह दूँ ?
जो है पानी उसे पानी बताया जाये ..
कुमार "जश्न"
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