Monday, November 12, 2018

मुझे विश्वास दे दो...

12 November 2013 को फेसबुक में डाली गयी मेरी रचना आज ब्लॉग के हवाले कर रहा हूँ। आशा करता हूँ आप तक पहुँच पाऊंगा। प्रतिक्रिया आमंत्रित हैं …
नहीं रोयेंगी कोई आँखे,
मुझे विश्वास दे दो !
सारी ज़मीं तुम रखलो,
मुझे आकाश दे दो …
बहुत हो चुकी तकरारें !
बहुत बन चुकी दीवारें !
तोड़ कर सारी सरहदें,
परिंदो को आकाश दे दो…
ग़म सबके कम हो जाएँ ,
अधरों को मुस्कान मिले !
ले आओ सबकी तकलीफें,
सब-के-सब मेरे पास दे दो…
हीरे-मोती कब माँगा मै ?
एक एहसान कर मौला !
ज़मीर जिनके मर चुके,
उन लाशों में जान दे दो .…
… निशब्द अभय

Tuesday, November 6, 2018

लाईट लगाओ लाईट लगाओ आज दिवाली रे...

दीप जलाओ दीप जलाओ आज दिवाली रे ..
यह वाली कविता तो सुने होंगे आप इसमें कवि कहना चाहता है कि आप दीपावली में दीपक यानी दिया जलाएं। मुझे लगता है कि यह कविता थोड़ी old-fashioned हो गई है और वर्तमान समय के खाचे में फिट नहीं बैठती जरा आप ही सोचिए की आज के जमाने में कौन दिया जलाता है भाई ? वो भी मिट्टी का? धन की देवी लक्ष्मी के पूजा में मिट्टी का दिया जलाना थोड़ा ऑड सा लगता है। इस से इम्प्रेशन मैं बट्टा भी लग जाएगा। महालक्ष्मी क्या सोचेंगी कि इसको इतना धन संपदा दिया है और यह मेरी ही पूजा में मिट्टी के दीपक जला मेरा भक्त मेरे साथ बेमानी कर रहा है। देवी अगर एक बार सैड हो गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे!
यह बात सोच कर ही रूह कांप जाती है की पड़ोस वाले क्या कहेंगे? सोसाइटी के लोग क्या कहेंगे? बराबर वालों में नाक कट जाएगी? पास पड़ोस वाले हसेगे की इनके यहां भगवान का दिया हुआ सब कुछ है फिर भी देखो गरीबों की तरह दिया जला रहे हैं, बड़ी बदनामी हो जाएगी !
देखिए भाई पूजा तो शान का त्यौहार है जितना दिखा सके दिखाइए देवी देखेगी तो कृपा बरसेगी ही इसी लिये दिखावे में कोई कमी नहीं आनी चाहिए।
तो कैंडल जलाईए, चाइनीज लाइट लगाये, जमीन पर रंगोली बनाने की जहमत मत उठाइए सबसे अच्छा प्लास्टिक की पन्नी वाली चमकीली रंगोली चिपका दिजीये जो आपके घर की शोभा बढ़ाने के साथ लंबा चलेगा भी ।
चलो उस कविता वाली बात पर आते हैं घर पर इस कविता को लिखने वाले कवि उस समय के वर्तमान स्थिति में रहकर कविता लिखे होंगे तब जब बिजली की समुचित व्यवस्था नहीं थी नाही बाजार में सस्ते चाइनीज लाइट्स उपलब्ध थे. रंगोली तो गुलाल से जमीन पर बनाए जाते थे और दूसरे ही दिन छूमंतर हो जाते थे। समान समय में कविता को थोड़ा मॉडिफाई करने की जरूरत है मेरे अनुसार कुछ ऐसा होना चाहिए लाइट लगाओ लाइट लगाओ आज दिवाली रे
जमीन में तुम रंगोली चिपकाओ आज दिवाली रे
खूब पिज्जा और बर्गर खाओ आज दिवाली रे...

आप सोंच रहे होंगे की ये उलटी बांसुरी क्यों बजा रहा हूँ मैं तो साहब इसके जवाब में मैं आपको बता देता हूँ की ये कटाक्ष है उन देशभक्तो पर जो अपने त्यौहार को मनाने के लिए दुश्मन देश चीन के सामान को तवज्जो देते है, वे चीनी दिये, लाइट्स लगाकर अपने परंपरा का निर्वहन करना चाहते हैं. जो देश को खोखला किये  जा रहा है एक तरफ कुम्हार अपने चाक छोड़ बेरोजगारों के कतार में खड़ा हो रहे है, तो वहीं चीन हमारे पैसों से रोजगार पाकर हमें ही आँखे दिखा रहा है। सम्भल जाइये आप दीपावली में प्रकाश तो कर लेंगे लेकिन  कही न कही कालिख अपने देश में गिरेगा।।।।
कुमार अभय




Saturday, November 3, 2018

Bhai ko Happy Birthday


इन पर हमेशा ही नेतागिरी का भूत सवार रहता है
भाषण बाजी भी अच्छे हैं ।
इनकी राजनीतिक संसद तक नहीं, दिल तक पहुंचने वाली होती है।
कभी इनका मन होता है तो अंधेरे में अंडे बेचते हुए पढ़ रहे बच्चे को अपने जेब खर्च से मिनी इमरजेंसी लाइट खरीद कर दे आते हैं।
तो कभी नया मोड़ में चाय पीते समय खानाबदोश बच्चों को चाय और बिस्कुट दिलवा देते हैं।
और ऐसे कई सारे करामात ये अक्सर ही करते रहते हैं, मेरे लिए खुश होने वाली बात यह है कि इस अच्छे वाले बच्चे का दोस्त नहीं बडा भाई हूं।
जन्मदिन की अशेष शुभकामनाएं प्यारे भाई मोनू !!
दीर्घायु हो... ढेरों सफलता आपको हासिल हो ।
कुमार अभय

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ...

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ... एक जादूगर जादू करता था, तितली को कबूतर, कबूतर को बाज़ और बाज़ को मोर बना देता था। ...