आज आज ट्रेन में बैठे बैठे यह रचना हो गई...
बड़े दिनों बाद लिखा हूं कुछ बताइएगा जरूर कैसा हुआ है!
भावनाएँ ऐसे ना भड़काया जाये...
दिल बैचैन है तो समझाया जाये।
मुसीबते कब छोड़ती है पीछा
परेशानियों के मुह पर मुस्कुराया जाये ।
गुस्सैल आखें और हाथों में पत्थर
क्यों ना उसे फूल थमाया जाये ।
वो अक्ल का सिकंदर है तो क्या
अक्लमंदी को बेवकूफी समझाया जाये
कहते हैं बात करने से बात बढती है
इसी बात पर कुछ बात आगे बढाया जाये
जरूरी नही की हर फैसला चौराहा करे
कुछ धागे आंगन मे सुलझाया जाये
खुशी से ना उसकी आंखें भर जाये।
किसी को इतना भी ना हँसाया जाये।।
रेह्नुमा इसी बस्ती में कहीं रहता है।
क्यों ना हर दरवाजा खटखटाया जाये।।
ये दुनिया जो निशब्द होने चली है 'अभय'
उसके कानों मे क्यों ना कहानी सुनाई जाये।।
बड़े दिनों बाद लिखा हूं कुछ बताइएगा जरूर कैसा हुआ है!
भावनाएँ ऐसे ना भड़काया जाये...
दिल बैचैन है तो समझाया जाये।
मुसीबते कब छोड़ती है पीछा
परेशानियों के मुह पर मुस्कुराया जाये ।
गुस्सैल आखें और हाथों में पत्थर
क्यों ना उसे फूल थमाया जाये ।
वो अक्ल का सिकंदर है तो क्या
अक्लमंदी को बेवकूफी समझाया जाये
कहते हैं बात करने से बात बढती है
इसी बात पर कुछ बात आगे बढाया जाये
जरूरी नही की हर फैसला चौराहा करे
कुछ धागे आंगन मे सुलझाया जाये
खुशी से ना उसकी आंखें भर जाये।
किसी को इतना भी ना हँसाया जाये।।
रेह्नुमा इसी बस्ती में कहीं रहता है।
क्यों ना हर दरवाजा खटखटाया जाये।।
ये दुनिया जो निशब्द होने चली है 'अभय'
उसके कानों मे क्यों ना कहानी सुनाई जाये।।

