Thursday, December 26, 2013

गंगा अभी खुद ही बदलने को तैयार नहीं है.

"तू 'गंगा' तो नहीं है न ? मैली गंगा को साफ़ करने के कितने सारे जतन कर लिए गए.. कुछ नहीं हुआ. गंगा आज भी मैली है.
पर ऐसा नहीं है कि गंगा साफ हो ही नहीं सकती.
आज अपना रास्ता बदल ले गंगा .. सब साफ हो जायेगा. मगर वह बदलेगी नहीं .. आदत हो गयी है उसकी मैल के साथ जीने की. तब?
फिर भी साफ हो सकती है. जानना चाहेंगी कैसे ?
अभी उसका उदगम स्थल 'हिमालय' भरभरा का गिर पड़े तो उसका रास्ता खुद बदल जायेगा. रास्ता बदलेगा तो युगों से जमीं गन्दगी भी उसके तांडव-प्रवाह में नेस्तनाबूद हो जायेगी. साथ में सारी छोटी नदियां भी राह बदलेंगी.
हिमालय के गिरने पर विनाश और नया सृजन अवश्यम्भावी है .. मेरे गिरने पर नहीं.
क्योंकि मेरी गंगा अभी खुद ही बदलने को तैयार नहीं है."
- नए साल की पूर्व-संध्या में 'तथागत' के जन्म के बाद पुरुष के दृष्टिकोण से दुनिया को देख कर क्यों न कुछ लिखा जाये?

गाँधी का दोष रहा होगा...


जिन्ना की भूख रही होगी, गाँधी का दोष रहा होगा!!!
अब कोई सपना ना देखे, ये धरती बाँट ली जायेगी
जो पाकिस्तान पुकारेगी, वो जीभ काट ली जायेगी
जिनको भी मेरे भारत की धरती से प्यार नहीं होगा,
उनको भारत में रहने का कोई अधिकार नहीं होगा
धरती से अम्बर से कहना, हर ताल समंदर से कहना
कहना कारगिल की घाटी से, गोहाटी से चौपाटी से ,
ख़ूनी परिपाटी से कहना, दुश्मन की माटी से कहना 
कहना लोभी, मक्कारों से जासूसी करने वालों से,
जो मेरा आँगन तोड़ेगी वो बाँह तोड़ दी जाएगी,
जो आँख उठेगी भारत पर वो आँख फोड़ दी जाएगी,
सैंतालिस का बंटवारा भी कोई अंधा रोष रहा होगा
जिन्ना की भूख रही होगी, गाँधी का दोष रहा होगा,
जो भूल हुई हमसे पहले, वो भूल नहीं होने देंगे
हम एक इंच धरती भारत से अलग नहीं होने देंगे
जो सीमा पार पड़ोसी है उसको तो क्या समझाना है
वो बंटवारे का रोगी है उसका ये रोग पुराना है
लेकिन रावलपिंडी पहले अपने दामन में तो झाँके
अपने घर का आलम देखे मेरे आँगन में ना ताके
भारत में दखलंदाजी की तो पछताना पड़ जायेगा
रावलपिंडी, लाहौर, कराँची  तक भारत कहलायेगा !!!

Tuesday, December 10, 2013

उड़ान इरादों से होती है…

 मुझे नहीं मालूम क्या  ख़ास बात है इन  शब्दों में ? इसे लिखने के बाद एक नयी ऊर्जा का अनुभव कर रहा हूँ  !

                                                 कटे हो पंख क्या फ़र्क़ पड़ता है ???
                                अपनी उड़ान तो इरादों से होती है… 
                                                                                                         …  निःशब्द अभय







 

चांद से फूल से या मेरी ज़ुबाँ से सुनिये...



चांद से फूल से या मेरी ज़ुबाँ से सुनिए
हर तरफ आपका क़िस्सा हैं जहाँ से सुनिए

सबको आता नहीं दुनिया को सता कर जीना
ज़िन्दगी क्या है मुहब्बत की ज़बां से सुनिए

क्या ज़रूरी है कि हर पर्दा उठाया जाए
मेरे हालात भी अपने ही मकाँ से सुनिए

मेरी आवाज़ ही पर्दा है मेरे चेहरे का
मैं हूँ ख़ामोश जहाँ, मुझको वहाँ से सुनिए

कौन पढ़ सकता हैं पानी पे लिखी तहरीरें
किसने क्या लिक्ख़ा हैं ये आब--रवाँ से सुनिए

चांद में कैसे हुई क़ैद किसी घर की ख़ुशी
ये कहानी किसी मस्ज़िद की अज़ाँ से सुनिए
Nida Fazli

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ...

अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ... एक जादूगर जादू करता था, तितली को कबूतर, कबूतर को बाज़ और बाज़ को मोर बना देता था। ...