बहुत तेज़ दौड़ रहा था, कहीं पहुँचने के लिए बेतहाशा भाग रहा था। ऐसा भाग रहा था, मानो सबसे पहले मैं ही पहुँच जाऊँगा। भागते समय यह ख़याल भी नहीं रहा कि भागते-भागते चीज़ें पीछे छूटती जा रही हैं।दौड़ आज भी जारी है। आज भी दुनिया की नज़रों में किसी के आगे या किसी के पीछे भाग ही रहा हूँ। इस दौड़ पर कुछ लोग तालियाँ पीटते हैं, तो कुछ गालियाँ बरसाते हैं।इस भागमभाग में कुछ लोग आगे चले गए, तो कुछ पीछे छूट गए। जब मैं दौड़कर थक जाता हूँ या ठोकर खाकर गिर पड़ता हूँ, तब कुछ लोगों की तलाश करता हूँ कि कहाँ गए सब? अभी तो यहीं थे, साथ में? एक साथ ही तो चले थे! सभी को कहा गया था कि हाथ कसकर पकड़े रखना, ताकि कोई छूटे नहीं। लेकिन जब मैं थका हूँ, पाँव में चोट लगी है, तब कोई नज़र नहीं आता। पीछे जाकर उनकी तलाश करने की कोशिश करता हूँ, तो आगे की ओर बेतहाशा दौड़ती भीड़ मुझे कुचल देना चाहती है।कुछ देर रुककर इंतज़ार करता हूँ, तो भागने वाले लोग धक्का देकर मुझे किनारे कर देना चाहते हैं। हमारी बात हुई थी कि अगर हम में से किसी को ठोकर लगे, तो एक-दूसरे को मरहम लगाने का रिवाज़ बनाए रखेंगे। सफ़र का सारा सामान हम साथ लेकर चले थे।आज मुझे ठोकर लगी है, मैं थका हुआ हूँ, लेकिन हमारे पास कुछ भी नहीं—न हम, न मरहम! अगर कुछ है हमारे पास, तो वह है सफ़र, अपने हिस्से का... जो जारी रहेगा... ज़िंदा रहने तक!
ये कहाँ आ गए...?